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| Κύριος συγγραφέας: | |
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| Μορφή: | Recurso digital |
| Γλώσσα: | Χίντι |
| Έκδοση: |
Zenodo
2024
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| Θέματα: | |
| Διαθέσιμο Online: | https://doi.org/10.5281/zenodo.14378096 |
| Ετικέτες: |
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Πίνακας περιεχομένων:
- <p><span>भारतीय लोकतन्त्र ने पिछले </span>77<span> वर्षों में जिस तरह मजबूती से स्वयं को स्थापित किया है उसमें बहुत सारे कारकों का योगदान है। भारतीय जनता की भूमिका इसमें बहुत महत्वपूर्ण रही है। लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में निर्णय निर्माण प्रक्रिया में आम जनता की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। भारतीय लोकतन्त्र के पिछले </span>77<span> वर्षों के सफर ने इस बात को मजबूती से स्थापित किया हैं। आम जनता से तात्पर्य सामान्य रूप से उन सभी पुरुषों व महिलाओं से है जो मतदान के माध्यम से लोकतन्त्र में अपनी भागीदारी दर्ज कराते है। लेकिन इस भागीदारी में </span>‘<span>आधी आबादी</span>‘ <span>का प्रतिनिधित्व उचित नही है। आजादी के </span>77<span> वर्षों के बाद भी राष्ट्रीय एवं राज्यों की राजनीति में महिला प्रतिनिधियों की उपस्थिति निराशाजनक है। महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में </span>‘<span>महिला आरक्षण विधेयक</span>‘ <span>के रूप में उठाये गए कदम को राजनीतिक दलों के विरोध का सामना करना पड़ा। किन्तु नारी शक्ति वदंन अधिनियम के माध्यम से वर्तमान भाजपा सरकार ने महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की आवश्यकता को समझते हुए बेहतरीन पहल की है जो निश्चित रूप से भविष्य में भारतीय राजनीति में आधी आबादी की आवाज को मुखर बनाएगा। प्रस्तुत शोध पत्र के माध्यम से इसी विषय की पड़ताल करने का प्रयास किया गया है।</span></p>