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| 第一著者: | |
|---|---|
| フォーマット: | Recurso digital |
| 言語: | ヒンディー語 |
| 出版事項: |
Zenodo
2024
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| 主題: | |
| オンライン・アクセス: | https://doi.org/10.5281/zenodo.15347497 |
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目次:
- <p>भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है और उतना ही पुराना है भारतीय ज्ञान-परंपरा का इतिहास। कल्याणकारी होने के कारण सदियों तक संघर्षों से जूझते हुए भी प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवमयी परंपरा समस्त जगत् को आज भी आलोकित कर रही है। हमारी भारतीय चिंतन परंपरा विश्व की एकमात्र ऐसी चिंतन परंपरा है जिसके मूल्य आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। आध्यात्मिक मूल्यों से सुसज्जित भारतीय ज्ञान-परंपरा के विकास में ऐसे विभिन्न उन्नायकों का योगदान निहित है जिन्होंने विपरीत समय में इसकी मूल चेतना को अक्षुण्ण बनाये रखने के स्तुत्य प्रयास किये है। इतिहास में महायोगी गोरक्षनाथ ऐसे ही महाउन्नायक हुए जिन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को न केवल समृद्ध किया बल्कि उसे नई दिशा भी प्रदान की। नौ नाथों की परंपरा में गोरखनाथ सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं। उन्होंने सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य स्वीकार किया। वज्रयानी सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई, जिसे गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने पूर्ण गौरव प्रदान किया। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। उन्होंने नाथ पंथी साधना प्रक्रिया के प्रसार हेतु संस्कृत तथा तत्कालीन जनभाषा में अनेक ग्रंथों की रचना कर भारतीय ज्ञान-परम्परा की निर्मल स्रोतस्विनी को गति प्रदान की। प्रस्तुत शोध आलेख भारतीय ज्ञान-परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरखनाथ के अवदान को रेखांकित करने का ही एक विनम्र प्रयास है।</p>