Gorde:
| Egile nagusia: | |
|---|---|
| Formatua: | Recurso digital |
| Hizkuntza: | |
| Argitaratua: |
Zenodo
2020
|
| Sarrera elektronikoa: | https://doi.org/10.5281/zenodo.15570345 |
| Etiketak: |
Etiketa erantsi
Etiketarik gabe, Izan zaitez lehena erregistro honi etiketa jartzen!
|
Aurkibidea:
- <p><span lang="HI">राज्य को समाज में व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य प्राप्त करना होता है। इस दृष्टि से राज्य समाज के अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति का साधन है। भारत एक सनातन संस्कृति का वाहक राष्ट्र है। यही सनातनता शाश्वत के युगानुकूल प्रकटीकरण का हेतु सदैय रही है। इसे मनु भगवान</span><span>, </span><span lang="HI">भगवान बुद्ध</span><span>, </span><span lang="HI">महावीर स्वामी</span><span>, </span><span lang="HI">भगवान शंकराचार्य एवं मध्यकालीन संत परम्परा में मूर्त रूप प्रदान किया गया। बौद्धों के अति-अहिंसावाद से प्रारम्भ और फिर सम्यक दंडनीति के अमाय से पिछले एक हजार साल से भारतीय समाज निरन्तर क्षत् विक्षत किया जाता रहा है। प्रथम चरण मुस्लिम आततायी तंत्र का था</span><span>, </span><span lang="HI">जिसने तलवार के जोर पर भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का कार्य किया। कालांतर में अंग्रेजी साम्राज्यवादिता के प्रभाव ने अपने बहुआयामी उपनिवेशवाद के माध्यम से भारत की पूरी जीवन दृष्टि को ही विनाश के कगार पर पहुँचाने का कार्य किया। इसमे जितना योगदान अंग्रेजी शासकों और ईसाई धर्म प्रचारकों ने दिया</span><span>, </span><span lang="HI">उससे कई गुणा अधिक योगदान "आधुनिकतायादी भारतीयों का रहा। क्योंकि मैकाले की धारणा की विजय ने आधुनिक भारत को </span><span>'</span><span lang="HI">ज्ञान-संकरता</span><span>, </span><span lang="HI">कर्म-संकरता के साथ अनीति-पोषकता</span><span>' </span><span lang="HI">के एक फिसलन वाले रास्ते पर डाल दिया। अनुभव यह रहा कि भारतीयों का आधिपत्ययादियों से अन्तर्मिलन कभी शुभ नहीं रहा। उन्हें सदैव धोखा ही मिला। इस्लाम को पहली बार पनाह भारत में मिली</span><span>, </span><span lang="HI">बदले में उसने भारत और भारतीय सस्कृति को तलवार के दम पर रौदने का प्रयास किया। यही रूप अंग्रेजों ने भी दिखाया। आज आधुनिक भोगवाद जिसका केन्द्र यूरोप और अमेरिका से खिसककर चीन में स्थिर हो रहा है. भारत में भी इसका प्रभाव बहुत तेजी से फैल रहा है जिसके कारण आज भारतीय जीवन दृष्टि तथा उसकी लगभग १५ प्रतिशत भारतीय जनांकिकी संकट में है। हमारी सभी आवश्यकताए</span><span>, </span><span lang="HI">हमारे सभी समाबान</span><span>, </span><span lang="HI">हमारी नित्य-प्रति की जीवनशैली</span><span>, </span><span lang="HI">हमारे राजनीतिक आदर्श एवं उनकी कार्य पद्धति</span><span>, </span><span lang="HI">हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श के प्रतिमान</span><span>, </span><span lang="HI">यहाँ तक कि हमारे अध्ययन-अध्यापन चिंतन-मनन पर भी विदेशी प्रतिमानवाद हावी है। इसलिए हम स्वयं की बौद्धिक उपेक्षा में लगे है। सत्य और ज्ञान का प्रकाश चंड ओर हो</span><span>, </span><span lang="HI">पूरी मानवता इससे लाभान्वित हो</span><span>, </span><span lang="HI">मनु महाराज के इसी साध्य की पूर्ति हेतु उनके राजधर्म सिद्धांत की शाश्वत प्रासनिकता पर इस लेख को व्यवस्थित किया गया है। संगठनात्मक रूप में आधुनिक शासन तंत्र भी सांस्थानिक स्तरीकरण के यद्यपि जटिलतम मानकों को स्वीकार करते हैं</span><span>, </span><span lang="HI">परन्तु मनुस्मृति की तुलना में इनके लक्ष्य बदल गये। अब मानद की पुरुषार्थ सिद्धि के बजाय पूँजी</span><span>, </span><span lang="HI">तकनीक और अति उपभोक्तावाद लक्ष्य बन गए है. जो अपनी प्रकृति में ही विनाशक है। जिसकी वजह से मानवता कलंकित है. शासन तत्र दूषित है</span><span>, </span><span lang="HI">स्वार्थान्धी मानव की मानसिकता विकृत है। इसलिए राग-द्वेष के परे शाश्वत सत्य और ज्ञान जिसे ऋषियों ने संचित किया</span><span>, </span><span lang="HI">जो सबका है</span><span>, </span><span lang="HI">वह नमन के साथ शिरोधार्य हो।</span></p> <p><span>Key Words: </span><span lang="HI">मनु</span><span>, </span><span lang="HI">मानव</span><span>, </span><span lang="HI">धर्मशास्त्र</span><span>, </span><span lang="HI">भारत</span><span>,</span><span lang="HI"> </span><span lang="HI">इहलौकिकता</span><span>, </span><span lang="HI">आध्यात्मिकता।</span></p>