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Autore principale: डॉ महन्ती प्रसाद यादव
Natura: Recurso digital
Lingua:hindi
Pubblicazione: Zenodo 2026
Accesso online:https://doi.org/10.5281/zenodo.19144396
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Sommario:
  • <p>भारतीय समाज की संरचना में जाति एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल तत्व रही है। प्राचीन काल से ही समाज को वर्ण और जातियों में विभाजित किया गया, जिसने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। यह विभाजन न केवल व्यक्ति की पहचान तय करता रहा, बल्कि उसके अधिकारों, कर्तव्यों और अवसरों को भी निर्धारित करता रहा। समय के साथ यह जातिगत ढांचा शोषण और असमानता का कारण बना, जिससे वंचित और दलित समुदायों के जीवन में पीड़ा और संघर्ष स्थायी रूप से जुड़ गए। हिंदी साहित्य ने सदैव समाज के यथार्थ को अभिव्यक्त करने का कार्य किया है। जिस प्रकार समाज में जातिगत भेदभाव मौजूद रहा, उसी प्रकार साहित्य में भी इसका गहन विमर्श हुआ। विशेषकर 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘दलित साहित्य आंदोलन’ और ‘जातीय विमर्श’ साहित्य की केंद्रीय धारा बनकर उभरे।</p>