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| Autore principale: | |
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| Natura: | Recurso digital |
| Lingua: | |
| Pubblicazione: |
Zenodo
2026
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| Soggetti: | |
| Accesso online: | https://doi.org/10.5281/zenodo.19203710 |
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Sommario:
- <p><strong><em><span>गोषवारा</span></em></strong></p> <p><em><span>भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध बौद्धिक परंपराओं में से एक है, जिसका उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं बल्कि व्यक्ति और समाज के समग्र उत्थान से जुड़ा हुआ है। इस परंपरा के विकास और प्रसार में भाषा और साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी साहित्य ने भारतीय ज्ञान परंपरा को जनसामान्य तक पहुँचाने में सेतु का कार्य किया है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक हिंदी साहित्य ने दर्शन, भक्ति, नैतिकता, सामाजिक चेतना, राष्ट्रीयता और मानवीय मूल्यों को लोकभाषा में व्यक्त कर ज्ञान को व्यापक समाज से जोड़ा। विशेष रूप से भक्तिकाल में संत कवियों ने ज्ञान को कर्मकांड और सामाजिक रूढ़ियों से मुक्त कर उसे अनुभव, प्रेम और मानवता से जोड़ दिया। आधुनिक काल में हिंदी साहित्य ने सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और बौद्धिक जागरण को आगे बढ़ाया, जबकि स्वतंत्रता के बाद के साहित्य में दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्शों ने ज्ञान परंपरा को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाया। इस प्रकार हिंदी साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्व्याख्या करते हुए उसे लोकजीवन से जोड़ने का सशक्त माध्यम रहा है।</span></em></p> <p> </p>