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| Autor principal: | |
|---|---|
| Format: | Recurso digital |
| Idioma: | hindi |
| Publicat: |
Zenodo
2023
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| Matèries: | |
| Accés en línia: | https://doi.org/10.5281/zenodo.19509779 |
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Taula de continguts:
- <p>प्रस्तुत शोध पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक चिंतन के उस पक्ष को उद्घाटित करता है, जिसे उन्होंने 'लोकतंत्र के भारतीयकरण' की संज्ञा दी थी। उपाध्याय जी का मानना था कि स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने जिस लोकतांत्रिक ढांचे को स्वीकार किया, वह काफी हद तक पश्चिमी नकल था और भारतीय जनमानस की 'चिति' (आत्मा) से मेल नहीं खाता था। उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो 'धर्म' (नैतिक मर्यादा) और 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उत्थान) पर टिकी होनी चाहिए। यह लेख उनके द्वारा प्रतिपादित 'लोकमत-परिष्कार' और सहभागी शासन की दार्शनिक प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है, जो आज के चुनावी दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>