भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरक्षनाथ का अवदान

Fuente: Zenodo
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Autore principale: AWASTHI, SUDHIR KUMAR
Natura: Recurso digital
Lingua:hindi
Pubblicazione: Zenodo 2024
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author AWASTHI, SUDHIR KUMAR
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contents <p>भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है और उतना ही पुराना है भारतीय ज्ञान-परंपरा का इतिहास। कल्याणकारी होने के कारण सदियों तक संघर्षों से जूझते हुए भी प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवमयी परंपरा समस्त जगत् को आज भी आलोकित कर रही है। हमारी भारतीय चिंतन परंपरा विश्व की एकमात्र ऐसी चिंतन परंपरा है जिसके मूल्य आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। आध्यात्मिक मूल्यों से सुसज्जित भारतीय ज्ञान-परंपरा के विकास में ऐसे विभिन्न उन्नायकों का योगदान निहित है जिन्होंने विपरीत समय में इसकी मूल चेतना को अक्षुण्ण बनाये रखने के स्तुत्य प्रयास किये है। इतिहास में महायोगी गोरक्षनाथ ऐसे ही महाउन्नायक हुए जिन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को न केवल समृद्ध किया बल्कि उसे नई दिशा भी प्रदान की। नौ नाथों की परंपरा में गोरखनाथ सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं। उन्होंने सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य स्वीकार किया। वज्रयानी सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई, जिसे गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने पूर्ण गौरव प्रदान किया। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। उन्होंने नाथ पंथी साधना प्रक्रिया के प्रसार हेतु संस्कृत तथा तत्कालीन जनभाषा में अनेक ग्रंथों की रचना कर भारतीय ज्ञान-परम्परा की निर्मल स्रोतस्विनी को गति प्रदान की। प्रस्तुत शोध आलेख भारतीय ज्ञान-परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरखनाथ के अवदान को रेखांकित करने का ही एक विनम्र प्रयास है।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_15347497
institution Zenodo
language hin
publishDate 2024
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरक्षनाथ का अवदान
AWASTHI, SUDHIR KUMAR
हिंदी, गोरखनाथ,गोरक्षनाथ, भारतीय ज्ञान परंपरा, योगी, महायोगी
<p>भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है और उतना ही पुराना है भारतीय ज्ञान-परंपरा का इतिहास। कल्याणकारी होने के कारण सदियों तक संघर्षों से जूझते हुए भी प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवमयी परंपरा समस्त जगत् को आज भी आलोकित कर रही है। हमारी भारतीय चिंतन परंपरा विश्व की एकमात्र ऐसी चिंतन परंपरा है जिसके मूल्य आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। आध्यात्मिक मूल्यों से सुसज्जित भारतीय ज्ञान-परंपरा के विकास में ऐसे विभिन्न उन्नायकों का योगदान निहित है जिन्होंने विपरीत समय में इसकी मूल चेतना को अक्षुण्ण बनाये रखने के स्तुत्य प्रयास किये है। इतिहास में महायोगी गोरक्षनाथ ऐसे ही महाउन्नायक हुए जिन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को न केवल समृद्ध किया बल्कि उसे नई दिशा भी प्रदान की। नौ नाथों की परंपरा में गोरखनाथ सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं। उन्होंने सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य स्वीकार किया। वज्रयानी सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई, जिसे गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने पूर्ण गौरव प्रदान किया। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। उन्होंने नाथ पंथी साधना प्रक्रिया के प्रसार हेतु संस्कृत तथा तत्कालीन जनभाषा में अनेक ग्रंथों की रचना कर भारतीय ज्ञान-परम्परा की निर्मल स्रोतस्विनी को गति प्रदान की। प्रस्तुत शोध आलेख भारतीय ज्ञान-परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरखनाथ के अवदान को रेखांकित करने का ही एक विनम्र प्रयास है।</p>
title भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरक्षनाथ का अवदान
topic हिंदी, गोरखनाथ,गोरक्षनाथ, भारतीय ज्ञान परंपरा, योगी, महायोगी
url https://doi.org/10.5281/zenodo.15347497