स्वतंत्रोत्तर भारत में नारीवादी आंदोलन और स्त्री चेतना का विकास

Fuente: Zenodo
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Dettagli Bibliografici
Autore principale: Ideal Research Review
Natura: Recurso digital
Lingua:hindi
Pubblicazione: Zenodo 2025
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author Ideal Research Review
author_facet Ideal Research Review
contents <p><span lang="HI">नारीवादी शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। </span><span>‘‘</span><span lang="HI">नारी</span><span>’’ </span><span lang="HI">का अर्थ है स्त्री और वाद का अर्थ है आन्दोलन या सिद्धांत। नारीवाद के अभिप्राय है महिलाओं से जुड़े या संबंधित आन्दोलन और सिद्धांत। नारीवाद शब्द स्त्रियों में एक चेतना को जगाता है</span><span>, </span><span lang="HI">साथ ही नारीवादी व्यवस्था को बदलने के लिए सक्रिय भी करता है। नारीवादी सिद्धांत</span><span>, </span><span lang="HI">नारीवादी आन्दोलन से उभरी संघर्ष की गाथाएँ हैं जो महिलाओं के राजनैतिक</span><span>, </span><span lang="HI">सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न स्थानों एवं परिस्थितियों से लड़ी गई थी। नारीवादी सिद्धांतों का लैंगिक असमानता की प्रकृति एवं कारणों को समझना और उसके <span>    </span><span> </span>फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीतिक और शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर इसके असर की व्याख्या करना। भारतीय नारीवादी आन्दोलन की नींव स्वतंत्रता पूर्व युग में ही पड़ चुकी थी। </span><span>19</span><span lang="HI">वीं शताब्दी के राजा राम मोहन राय</span><span>, </span><span lang="HI">ईश्वर चन्द्र विद्यासागर</span><span>, </span><span lang="HI">पंडित रमाबाई</span><span>, </span><span lang="HI">सावित्री बाई फूले जैसे सुधारकों ने स्त्री शिक्षा</span><span>, </span><span lang="HI">सती प्रथा</span><span>, </span><span lang="HI">बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दाें पर सुधार की माँंग की। इस चरण में भारतीय महिलाएँ जागृ्रति और राष्ट्रवाद जैसी स्वतंत्रता आन्दोलन की विशेषताओं की समझ पाई। जहाँ एक तरफ विभिन्न राष्ट्रवादी और समाज सुधारकों द्वारा स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए गए</span><span>, </span><span lang="HI">वहीं दूसरी तरफ महिला संगठनों की संख्या में बढ़ोतरी हुई</span><span>, </span><span lang="HI">जिसमें प्रमुख हैं-भारतीय महिला संध (</span><span>1919), </span><span lang="HI">भारतीय महिलाओं का राष्ट्रीय परिषद् और </span><span>1927</span><span lang="HI"> का अखिल भारतीय महिलाओं का सम्मेलन आदि। उस दौर में महात्मा गाँधी जी ने महिलाओं में आत्मविश्वास का संचार कर और उन्हें सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया। इन्होंने महिलाओं और पुरुषों को बराबरी के स्थान पर रखा। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और भौतिक विकास के लिए पुरुषों से सहयोग और बराबरी का<span>    </span>अधिकार देने की बात कही।</span></p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_16250681
institution Zenodo
language hin
publishDate 2025
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle स्वतंत्रोत्तर भारत में नारीवादी आंदोलन और स्त्री चेतना का विकास
Ideal Research Review
<p><span lang="HI">नारीवादी शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। </span><span>‘‘</span><span lang="HI">नारी</span><span>’’ </span><span lang="HI">का अर्थ है स्त्री और वाद का अर्थ है आन्दोलन या सिद्धांत। नारीवाद के अभिप्राय है महिलाओं से जुड़े या संबंधित आन्दोलन और सिद्धांत। नारीवाद शब्द स्त्रियों में एक चेतना को जगाता है</span><span>, </span><span lang="HI">साथ ही नारीवादी व्यवस्था को बदलने के लिए सक्रिय भी करता है। नारीवादी सिद्धांत</span><span>, </span><span lang="HI">नारीवादी आन्दोलन से उभरी संघर्ष की गाथाएँ हैं जो महिलाओं के राजनैतिक</span><span>, </span><span lang="HI">सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न स्थानों एवं परिस्थितियों से लड़ी गई थी। नारीवादी सिद्धांतों का लैंगिक असमानता की प्रकृति एवं कारणों को समझना और उसके <span>    </span><span> </span>फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीतिक और शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर इसके असर की व्याख्या करना। भारतीय नारीवादी आन्दोलन की नींव स्वतंत्रता पूर्व युग में ही पड़ चुकी थी। </span><span>19</span><span lang="HI">वीं शताब्दी के राजा राम मोहन राय</span><span>, </span><span lang="HI">ईश्वर चन्द्र विद्यासागर</span><span>, </span><span lang="HI">पंडित रमाबाई</span><span>, </span><span lang="HI">सावित्री बाई फूले जैसे सुधारकों ने स्त्री शिक्षा</span><span>, </span><span lang="HI">सती प्रथा</span><span>, </span><span lang="HI">बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दाें पर सुधार की माँंग की। इस चरण में भारतीय महिलाएँ जागृ्रति और राष्ट्रवाद जैसी स्वतंत्रता आन्दोलन की विशेषताओं की समझ पाई। जहाँ एक तरफ विभिन्न राष्ट्रवादी और समाज सुधारकों द्वारा स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए गए</span><span>, </span><span lang="HI">वहीं दूसरी तरफ महिला संगठनों की संख्या में बढ़ोतरी हुई</span><span>, </span><span lang="HI">जिसमें प्रमुख हैं-भारतीय महिला संध (</span><span>1919), </span><span lang="HI">भारतीय महिलाओं का राष्ट्रीय परिषद् और </span><span>1927</span><span lang="HI"> का अखिल भारतीय महिलाओं का सम्मेलन आदि। उस दौर में महात्मा गाँधी जी ने महिलाओं में आत्मविश्वास का संचार कर और उन्हें सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया। इन्होंने महिलाओं और पुरुषों को बराबरी के स्थान पर रखा। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और भौतिक विकास के लिए पुरुषों से सहयोग और बराबरी का<span>    </span>अधिकार देने की बात कही।</span></p>
title स्वतंत्रोत्तर भारत में नारीवादी आंदोलन और स्त्री चेतना का विकास
url https://doi.org/10.5281/zenodo.16250681