भारतीय ज्ञान परंपरा में पंचायती राज व्यवस्था और लोकतंत्र : एक मूल्यांकन

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Main Author: कुमार, डॉ. रजनीश
Format: Recurso digital
Language:Hindi
Published: Zenodo 2025
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author कुमार, डॉ. रजनीश
author_facet कुमार, डॉ. रजनीश
contents <p>भारत एक विशाल और विविधताओं से भरपूर देश है, जिसकी सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक परंपराएं हजारों वर्षों में विकसित हुई हैं। यहां के समाज ने सदैव समन्वय, सह-अस्तित्व और संवाद को जीवन का मूलभूत अंग माना है। भारतीय समाज की यही विशिष्टता उसे अन्य समाजों से अलग करती है कृ जहाँ सत्ता के केंद्रीकरण के बजाय सामूहिक निर्णय, जनसहभागिता और नैतिक उत्तरदायित्व की भावना प्रबल रही है। यही भावना “पंचायती राज” जैसे संस्थागत स्वरूपों का प्राचीन आधार रही है। पंचायती राज व्यवस्था कोई नवीन अवधारणा नहीं है जिसे आधुनिक भारत ने पश्चिमी लोकतांत्रिक प्रणाली से उधार लिया हो, बल्कि यह भारत की आत्मा में समाहित एक जीवंत प्रणाली रही है। वैदिक काल में ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो स्पष्ट करते हैं कि सामूहिक चर्चा और जन-निर्णय भारतीय ज्ञान परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। ये संस्थाएँ केवल प्रशासनिक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक नियंत्रण और सामुदायिक समरसता की धुरी थीं।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_16411771
institution Zenodo
language hin
publishDate 2025
publisher Zenodo
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spellingShingle भारतीय ज्ञान परंपरा में पंचायती राज व्यवस्था और लोकतंत्र : एक मूल्यांकन
कुमार, डॉ. रजनीश
<p>भारत एक विशाल और विविधताओं से भरपूर देश है, जिसकी सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक परंपराएं हजारों वर्षों में विकसित हुई हैं। यहां के समाज ने सदैव समन्वय, सह-अस्तित्व और संवाद को जीवन का मूलभूत अंग माना है। भारतीय समाज की यही विशिष्टता उसे अन्य समाजों से अलग करती है कृ जहाँ सत्ता के केंद्रीकरण के बजाय सामूहिक निर्णय, जनसहभागिता और नैतिक उत्तरदायित्व की भावना प्रबल रही है। यही भावना “पंचायती राज” जैसे संस्थागत स्वरूपों का प्राचीन आधार रही है। पंचायती राज व्यवस्था कोई नवीन अवधारणा नहीं है जिसे आधुनिक भारत ने पश्चिमी लोकतांत्रिक प्रणाली से उधार लिया हो, बल्कि यह भारत की आत्मा में समाहित एक जीवंत प्रणाली रही है। वैदिक काल में ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो स्पष्ट करते हैं कि सामूहिक चर्चा और जन-निर्णय भारतीय ज्ञान परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। ये संस्थाएँ केवल प्रशासनिक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक नियंत्रण और सामुदायिक समरसता की धुरी थीं।</p>
title भारतीय ज्ञान परंपरा में पंचायती राज व्यवस्था और लोकतंत्र : एक मूल्यांकन
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