राज्य अभिरक्षा और जीवन-हानि: संवैधानिक जवाबदेही एवं विधिक परिणाम
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Zenodo
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| Hauptverfasser: | , |
|---|---|
| Format: | Recurso digital |
| Veröffentlicht: |
Zenodo
2025
|
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| _version_ | 1866901124161732608 |
|---|---|
| author | सचिन, कुमार यादव काज़ी, नदीम आलम |
| author_facet | सचिन, कुमार यादव काज़ी, नदीम आलम |
| contents | <div> <p><span lang="HI">भारत में “कस्टोडियल डेथ” (अभिरक्षा में मृत्यु) केवल एक आपराधिक घटना नहीं</span><span>, <span lang="HI">बल्कि संवैधानिक शासन</span>, <span lang="HI">विधि-राज्य और मानव गरिमा की अवधारणा के समक्ष एक गहरी संस्थागत चुनौती है। राज्य द्वारा वैध रूप से स्वतंत्रता-हरण (गिरफ्तारी</span>, <span lang="HI">हिरासत</span>, <span lang="HI">रिमांड</span>, <span lang="HI">कारावास) किए जाने की स्थिति में व्यक्ति का जीवन और शारीरिक-मानसिक अखंडता राज्य की “सकारात्मक जिम्मेदारी” (सकारात्मक दायित्व) के क्षेत्र में आ जाती है</span>, <span lang="HI">अर्थात् राज्य केवल हस्तक्षेप न करने तक सीमित नहीं रहता</span>, <span lang="HI">बल्कि सुरक्षा</span>, <span lang="HI">चिकित्सा</span>, <span lang="HI">निगरानी</span>, <span lang="HI">पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का कर्तव्य निभाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह शोधपत्र राज्य अभिरक्षा में मृत्यु के संवैधानिक आधार</span>, <span lang="HI">दण्ड-विधिक परिणामों और प्रक्रिया-संबंधी जवाबदेही ढांचे का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।</span></span></p> <p><span lang="HI">यह अध्ययन तीन स्तरों पर केंद्रित है। प्रथम</span><span>, <span lang="HI">संवैधानिक उत्तरदायित्व: अनुच्छेद </span>21<span lang="HI"> के अंतर्गत जीवन के अधिकार और गरिमा की रक्षा</span>, <span lang="HI">तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित “पब्लिक लॉ क्षतिपूर्ति” (</span>public law compensation) <span lang="HI">का सिद्धांत</span>, <span lang="HI">विशेषतः अवैध निरोध और अभिरक्षा-हिंसा/मृत्यु की परिस्थितियों में (रुदुल साह वी. बिहार राज्य</span>, 1983; <span lang="HI">नीलाबती बेहरा वी. उड़ीसा राज्य</span>, 1993)<span lang="HI">। द्वितीय</span>, <span lang="HI">विधिक परिणाम: भारतीय न्याय संहिता</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत आपराधिक उत्तरदायित्व (उदाहरणार्थ</span>, <span lang="HI">दोषपूर्ण मानव वध</span>, <span lang="HI">हत्या</span>, <span lang="HI">लापरवाही से मृत्यु</span>, <span lang="HI">तथा स्वीकारोक्ति उगलवाने हेतु चोट पहुँचाने जैसे विशिष्ट प्रावधान) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य अधिनियम</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत पुलिस अभिरक्षा में स्वीकारोक्ति की निष्प्रभाविता तथा “डिस्कवरी” (</span>discovery) <span lang="HI">अपवाद की भूमिका (भारतीय न्याय संहिता</span>, 2023; <span lang="HI">भारतीय साक्ष्य अधिनियम</span>, 2023)<span lang="HI">। तृतीय</span>, <span lang="HI">प्रक्रिया और संस्थागत निगरानी: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत मजिस्ट्रेटीय जांच की अनिवार्यता और शव को चिकित्सकीय परीक्षण हेतु अग्रसारित करने जैसी शर्तें</span>, <span lang="HI">तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा </span>24<span lang="HI"> घंटे में रिपोर्टिंग और पोस्टमॉर्टम की वीडियो-फिल्मिंग संबंधी दिशानिर्देश (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता</span>, 2023; <span lang="HI">नहरक</span>, 1993/1995)<span lang="HI">। </span></span></p> <p><span lang="HI">अंततः यह शोधपत्र उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर यह दिखाता है कि पुलिस अभिरक्षा से संबंधित मामलों का वितरण कुछ राज्यों में अधिक केंद्रित दिखाई देता है (लोकसभा</span><span>, 2023), <span lang="HI">जबकि न्यायिक अभिरक्षा में मृत्यु की सूचनाएँ/इंटीमेशन संख्या में कहीं अधिक हैं (एनएचआरसी</span>, 2023-24 <span lang="HI">वार्षिक रिपोर्ट)। यह स्थिति सुधारों के दोहरे एजेंडे की ओर संकेत करती है: पुलिस हिरासत की पारदर्शिता और दण्डनीयता के साथ-साथ कारागार/न्यायिक अभिरक्षा में चिकित्सा-देखभाल</span>, <span lang="HI">मानसिक स्वास्थ्य और व्यवस्थागत निगरानी को समान प्राथमिकता देना।</span></span></p> </div> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_17943685 |
| institution | Zenodo |
| language | |
| publishDate | 2025 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | राज्य अभिरक्षा और जीवन-हानि: संवैधानिक जवाबदेही एवं विधिक परिणाम सचिन, कुमार यादव काज़ी, नदीम आलम <div> <p><span lang="HI">भारत में “कस्टोडियल डेथ” (अभिरक्षा में मृत्यु) केवल एक आपराधिक घटना नहीं</span><span>, <span lang="HI">बल्कि संवैधानिक शासन</span>, <span lang="HI">विधि-राज्य और मानव गरिमा की अवधारणा के समक्ष एक गहरी संस्थागत चुनौती है। राज्य द्वारा वैध रूप से स्वतंत्रता-हरण (गिरफ्तारी</span>, <span lang="HI">हिरासत</span>, <span lang="HI">रिमांड</span>, <span lang="HI">कारावास) किए जाने की स्थिति में व्यक्ति का जीवन और शारीरिक-मानसिक अखंडता राज्य की “सकारात्मक जिम्मेदारी” (सकारात्मक दायित्व) के क्षेत्र में आ जाती है</span>, <span lang="HI">अर्थात् राज्य केवल हस्तक्षेप न करने तक सीमित नहीं रहता</span>, <span lang="HI">बल्कि सुरक्षा</span>, <span lang="HI">चिकित्सा</span>, <span lang="HI">निगरानी</span>, <span lang="HI">पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का कर्तव्य निभाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह शोधपत्र राज्य अभिरक्षा में मृत्यु के संवैधानिक आधार</span>, <span lang="HI">दण्ड-विधिक परिणामों और प्रक्रिया-संबंधी जवाबदेही ढांचे का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।</span></span></p> <p><span lang="HI">यह अध्ययन तीन स्तरों पर केंद्रित है। प्रथम</span><span>, <span lang="HI">संवैधानिक उत्तरदायित्व: अनुच्छेद </span>21<span lang="HI"> के अंतर्गत जीवन के अधिकार और गरिमा की रक्षा</span>, <span lang="HI">तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित “पब्लिक लॉ क्षतिपूर्ति” (</span>public law compensation) <span lang="HI">का सिद्धांत</span>, <span lang="HI">विशेषतः अवैध निरोध और अभिरक्षा-हिंसा/मृत्यु की परिस्थितियों में (रुदुल साह वी. बिहार राज्य</span>, 1983; <span lang="HI">नीलाबती बेहरा वी. उड़ीसा राज्य</span>, 1993)<span lang="HI">। द्वितीय</span>, <span lang="HI">विधिक परिणाम: भारतीय न्याय संहिता</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत आपराधिक उत्तरदायित्व (उदाहरणार्थ</span>, <span lang="HI">दोषपूर्ण मानव वध</span>, <span lang="HI">हत्या</span>, <span lang="HI">लापरवाही से मृत्यु</span>, <span lang="HI">तथा स्वीकारोक्ति उगलवाने हेतु चोट पहुँचाने जैसे विशिष्ट प्रावधान) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य अधिनियम</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत पुलिस अभिरक्षा में स्वीकारोक्ति की निष्प्रभाविता तथा “डिस्कवरी” (</span>discovery) <span lang="HI">अपवाद की भूमिका (भारतीय न्याय संहिता</span>, 2023; <span lang="HI">भारतीय साक्ष्य अधिनियम</span>, 2023)<span lang="HI">। तृतीय</span>, <span lang="HI">प्रक्रिया और संस्थागत निगरानी: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता</span>, 2023<span lang="HI"> के अंतर्गत मजिस्ट्रेटीय जांच की अनिवार्यता और शव को चिकित्सकीय परीक्षण हेतु अग्रसारित करने जैसी शर्तें</span>, <span lang="HI">तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा </span>24<span lang="HI"> घंटे में रिपोर्टिंग और पोस्टमॉर्टम की वीडियो-फिल्मिंग संबंधी दिशानिर्देश (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता</span>, 2023; <span lang="HI">नहरक</span>, 1993/1995)<span lang="HI">। </span></span></p> <p><span lang="HI">अंततः यह शोधपत्र उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर यह दिखाता है कि पुलिस अभिरक्षा से संबंधित मामलों का वितरण कुछ राज्यों में अधिक केंद्रित दिखाई देता है (लोकसभा</span><span>, 2023), <span lang="HI">जबकि न्यायिक अभिरक्षा में मृत्यु की सूचनाएँ/इंटीमेशन संख्या में कहीं अधिक हैं (एनएचआरसी</span>, 2023-24 <span lang="HI">वार्षिक रिपोर्ट)। यह स्थिति सुधारों के दोहरे एजेंडे की ओर संकेत करती है: पुलिस हिरासत की पारदर्शिता और दण्डनीयता के साथ-साथ कारागार/न्यायिक अभिरक्षा में चिकित्सा-देखभाल</span>, <span lang="HI">मानसिक स्वास्थ्य और व्यवस्थागत निगरानी को समान प्राथमिकता देना।</span></span></p> </div> |
| title | राज्य अभिरक्षा और जीवन-हानि: संवैधानिक जवाबदेही एवं विधिक परिणाम |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.17943685 |