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Main Author: रत्नेश, कुमार
Format: Recurso digital
Language:
Published: Zenodo 2025
Online Access:https://doi.org/10.5281/zenodo.17964408
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author रत्नेश, कुमार
author_facet रत्नेश, कुमार
contents <div> <p><span lang="HI">पर्यावरण शब्द “परि” और “आवरण” शब्दों के संयोग से बना है</span><span>, <span lang="HI">जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘जो परितः आवृत्त है। समस्त जीवधारियों के चारों ओर का जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं। 18वीं शताब्दी के घटित औद्योगिक क्रान्ति से लेकर 21वीं शताब्दी तक मानव सभ्यता ने अपने प्रगति और विकास के लिए जिस प्रकार से प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन किया उसके परिणामस्वरूप आज पृथ्वी का पर्यावरण सन्तुलन विघटन के कगार पर पहुँच गयी है। यह सम्पूर्ण विश्व के पारिस्थितिकी को प्रभावित कर रहा है। 20वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में पर्यावरण क्षरण एवं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली असैनिक समस्याओं ने विश्व के समस्त राष्ट्रों को अपनी ओर आकृष्ट किया तथा पर्यावरणविदों ने अपने चिन्तन द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि इन चुनौतियों के सम्मुख राष्ट्र राज्य</span>, <span lang="HI">राष्ट्रीय सीमायें और भू-भाग संबंधी संप्रभुता जैसी धारणाओं के स्थान पर पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों ने मानव सभ्यता की उत्तरजीविता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।</span></span></p> <p><span lang="HI">21वीं शताब्दी के दौर में सम्पूर्ण मानव जाति को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है यह चुनौती मानव जाति के अस्तित्व की है। हमारे परिवेश का वातावरण इस प्रकार से रूपान्तरित हो रहा है जो मानव समुदाय के लिए समस्या के रूप में स्थापित हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों में हो रही तेजी से क्षय के साथ मानव जाति आखिर कब तक जीवित रह पायेगी।</span></p> </div>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_17964408
institution Zenodo
language
publishDate 2025
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle पर्यावरण सुरक्षा : अवधारणा, समस्या, समाधान
रत्नेश, कुमार
<div> <p><span lang="HI">पर्यावरण शब्द “परि” और “आवरण” शब्दों के संयोग से बना है</span><span>, <span lang="HI">जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘जो परितः आवृत्त है। समस्त जीवधारियों के चारों ओर का जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं। 18वीं शताब्दी के घटित औद्योगिक क्रान्ति से लेकर 21वीं शताब्दी तक मानव सभ्यता ने अपने प्रगति और विकास के लिए जिस प्रकार से प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन किया उसके परिणामस्वरूप आज पृथ्वी का पर्यावरण सन्तुलन विघटन के कगार पर पहुँच गयी है। यह सम्पूर्ण विश्व के पारिस्थितिकी को प्रभावित कर रहा है। 20वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में पर्यावरण क्षरण एवं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली असैनिक समस्याओं ने विश्व के समस्त राष्ट्रों को अपनी ओर आकृष्ट किया तथा पर्यावरणविदों ने अपने चिन्तन द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि इन चुनौतियों के सम्मुख राष्ट्र राज्य</span>, <span lang="HI">राष्ट्रीय सीमायें और भू-भाग संबंधी संप्रभुता जैसी धारणाओं के स्थान पर पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों ने मानव सभ्यता की उत्तरजीविता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।</span></span></p> <p><span lang="HI">21वीं शताब्दी के दौर में सम्पूर्ण मानव जाति को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है यह चुनौती मानव जाति के अस्तित्व की है। हमारे परिवेश का वातावरण इस प्रकार से रूपान्तरित हो रहा है जो मानव समुदाय के लिए समस्या के रूप में स्थापित हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों में हो रही तेजी से क्षय के साथ मानव जाति आखिर कब तक जीवित रह पायेगी।</span></p> </div>
title पर्यावरण सुरक्षा : अवधारणा, समस्या, समाधान
url https://doi.org/10.5281/zenodo.17964408