पर्यावरणीय न्याय एवं मानवाधिकार: जलवायु असमानता का भूगोल

Fuente: Zenodo
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Autor principal: देवेंद्र सिंह खटाना
Formato: Recurso digital
Lenguaje:hindi
Publicado: Zenodo 2025
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author देवेंद्र सिंह खटाना
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contents <p>जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय संकट नहीं रह गया है, बल्कि मानव अधिकारों, सामाजिक समानता और वैश्विक न्याय का अत्यंत गंभीर, बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रश्न बन चुका है। इसके दुष्प्रभाव विश्व के विभिन्न देशों, क्षेत्रों और समुदायों में समान रूप से वितरित नहीं हैं, बल्कि यह वितरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक संरचनाओं, संसाधनों की असमान उपलब्धता और ऐतिहासिक औपनिवेशिक विरासत जैसे कारकों से गहराई से प्रभावित होता है। विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों, कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं, ग्रामीण और शुष्क क्षेत्रों, आदिवासी समुदायों, निर्बल वर्गों, प्रवासी मजदूरों, महिलाओं, बच्चों तथा सामाजिक रूप से हाशिए पर मौजूद समूहों को जलवायु परिवर्तन के परिणामों का सर्वाधिक और अपेक्षाकृत अधिक विनाशकारी भार उठाना पड़ता है। इस शोध-पत्र का उद्देश्य पर्यावरणीय न्याय, मानवाधिकार और जलवायु असमानता के भौगोलिक आयामों का गहन विश्लेषण करना है तथा यह समझना है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विषमताओं को और अधिक गहरा, विस्तृत और जटिल बनाता है। इसके अतिरिक्त, यह लेख यह भी रेखांकित करता है कि जलवायु जोखिमों की तीव्रता उन समुदायों में अधिक देखी जाती है जिनके पास अनुकूलन के संसाधन, तकनीकी पहुँच और संस्थागत समर्थन सीमित होता है। अंततः, शोध यह प्रस्तावित करता है कि न्यायपूर्ण जलवायु नीति, समावेशी अनुकूलन रणनीतियाँ, स्थानीय समुदायों की निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी, जलवायु वित्त तक समान पहुँच तथा मानवाधिकार-आधारित दृष्टिकोण ही जलवायु असमानता को कम करने का प्रभावी, टिकाऊ और न्यायसंगत मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_18185820
institution Zenodo
language hin
publishDate 2025
publisher Zenodo
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spellingShingle पर्यावरणीय न्याय एवं मानवाधिकार: जलवायु असमानता का भूगोल
देवेंद्र सिंह खटाना
पर्यावरणीय न्याय, जलवायु असमानता, मानवाधिकार, भूगोल, संवेदनशीलता, वैश्विक दक्षिण, जलवायु शासन।
<p>जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय संकट नहीं रह गया है, बल्कि मानव अधिकारों, सामाजिक समानता और वैश्विक न्याय का अत्यंत गंभीर, बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रश्न बन चुका है। इसके दुष्प्रभाव विश्व के विभिन्न देशों, क्षेत्रों और समुदायों में समान रूप से वितरित नहीं हैं, बल्कि यह वितरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक संरचनाओं, संसाधनों की असमान उपलब्धता और ऐतिहासिक औपनिवेशिक विरासत जैसे कारकों से गहराई से प्रभावित होता है। विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों, कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं, ग्रामीण और शुष्क क्षेत्रों, आदिवासी समुदायों, निर्बल वर्गों, प्रवासी मजदूरों, महिलाओं, बच्चों तथा सामाजिक रूप से हाशिए पर मौजूद समूहों को जलवायु परिवर्तन के परिणामों का सर्वाधिक और अपेक्षाकृत अधिक विनाशकारी भार उठाना पड़ता है। इस शोध-पत्र का उद्देश्य पर्यावरणीय न्याय, मानवाधिकार और जलवायु असमानता के भौगोलिक आयामों का गहन विश्लेषण करना है तथा यह समझना है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विषमताओं को और अधिक गहरा, विस्तृत और जटिल बनाता है। इसके अतिरिक्त, यह लेख यह भी रेखांकित करता है कि जलवायु जोखिमों की तीव्रता उन समुदायों में अधिक देखी जाती है जिनके पास अनुकूलन के संसाधन, तकनीकी पहुँच और संस्थागत समर्थन सीमित होता है। अंततः, शोध यह प्रस्तावित करता है कि न्यायपूर्ण जलवायु नीति, समावेशी अनुकूलन रणनीतियाँ, स्थानीय समुदायों की निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी, जलवायु वित्त तक समान पहुँच तथा मानवाधिकार-आधारित दृष्टिकोण ही जलवायु असमानता को कम करने का प्रभावी, टिकाऊ और न्यायसंगत मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।</p>
title पर्यावरणीय न्याय एवं मानवाधिकार: जलवायु असमानता का भूगोल
topic पर्यावरणीय न्याय, जलवायु असमानता, मानवाधिकार, भूगोल, संवेदनशीलता, वैश्विक दक्षिण, जलवायु शासन।
url https://doi.org/10.5281/zenodo.18185820