हाशिये से मुख्यधारा तक: बिहार में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों की भूमिका का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन
Fuente:
Zenodo
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| Autore principale: | |
|---|---|
| Natura: | Recurso digital |
| Lingua: | hindi |
| Pubblicazione: |
Zenodo
2026
|
| Accesso online: | |
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| _version_ | 1866901443883040768 |
|---|---|
| author | अनिल कुमार |
| author_facet | अनिल कुमार |
| contents | <p><em><span lang="EN-US">विकास की समावेशी प्रक्रिया में दिव्यांगजनों (Persons with Disabilities) की भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। बिहार जैसे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। यह अध्ययन राज्य स्तरीय संस्थानों जैसे बिहार राज्य दिव्यांगजन आयोग, एवं गैर-सरकारी संगठनों जैसे 'विकलांग विकास संस्थान' और 'नशा मुक्ति परिषद' की भूमिका का मूल्यांकन करता है।</span></em></p> <p><em><span lang="EN-US"><span> </span>इस शोध का उद्देश्य सरकारी योजनाओं जैसे दिव्यांगजन स्वरोजगार योजना, समावेशी शिक्षा कार्यक्रम, एवं कौशल विकास प्रशिक्षणों के प्रभाव और क्रियान्वयन की पड़ताल करना है। शोध के अंतर्गत गया और पटना जिलों में किए गए केस स्टडीज के माध्यम से यह देखा गया कि प्रशासनिक जटिलताएं, सामाजिक दृष्टिकोण, और भौतिक संरचनाओं की कमी इन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में बाधा बनती हैं। </span></em><em><span lang="EN-US">साथ ही, यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि कैसे स्थानीय गैर-सरकारी संगठन जमीनी स्तर पर जागरूकता, अधिकारों की जानकारी, और सामाजिक समावेश की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाजशास्त्रीय रूपरेखा के अंतर्गत इस शोध में "सामाजिक </span></em><em><span lang="HI">विरल</span></em><em><span lang="EN-US">टन" (Alienation) और "क्षमता दृष्टिकोण" (Capability Approach - Amartya Sen) का प्रयोग किया गया है।</span></em></p> <p><em><span lang="EN-US"><span> </span>अंततः, शोध इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि विकेंद्रीकृत, अधिकार-आधारित और उत्तरदायी नीतियां ही दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकती हैं।</span></em></p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_18481092 |
| institution | Zenodo |
| language | hin |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | हाशिये से मुख्यधारा तक: बिहार में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों की भूमिका का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन अनिल कुमार <p><em><span lang="EN-US">विकास की समावेशी प्रक्रिया में दिव्यांगजनों (Persons with Disabilities) की भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। बिहार जैसे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। यह अध्ययन राज्य स्तरीय संस्थानों जैसे बिहार राज्य दिव्यांगजन आयोग, एवं गैर-सरकारी संगठनों जैसे 'विकलांग विकास संस्थान' और 'नशा मुक्ति परिषद' की भूमिका का मूल्यांकन करता है।</span></em></p> <p><em><span lang="EN-US"><span> </span>इस शोध का उद्देश्य सरकारी योजनाओं जैसे दिव्यांगजन स्वरोजगार योजना, समावेशी शिक्षा कार्यक्रम, एवं कौशल विकास प्रशिक्षणों के प्रभाव और क्रियान्वयन की पड़ताल करना है। शोध के अंतर्गत गया और पटना जिलों में किए गए केस स्टडीज के माध्यम से यह देखा गया कि प्रशासनिक जटिलताएं, सामाजिक दृष्टिकोण, और भौतिक संरचनाओं की कमी इन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में बाधा बनती हैं। </span></em><em><span lang="EN-US">साथ ही, यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि कैसे स्थानीय गैर-सरकारी संगठन जमीनी स्तर पर जागरूकता, अधिकारों की जानकारी, और सामाजिक समावेश की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाजशास्त्रीय रूपरेखा के अंतर्गत इस शोध में "सामाजिक </span></em><em><span lang="HI">विरल</span></em><em><span lang="EN-US">टन" (Alienation) और "क्षमता दृष्टिकोण" (Capability Approach - Amartya Sen) का प्रयोग किया गया है।</span></em></p> <p><em><span lang="EN-US"><span> </span>अंततः, शोध इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि विकेंद्रीकृत, अधिकार-आधारित और उत्तरदायी नीतियां ही दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकती हैं।</span></em></p> |
| title | हाशिये से मुख्यधारा तक: बिहार में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों की भूमिका का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.18481092 |