स्त्री प्रस्तुति हिंदी नाटकों में: एक आलोचनात्मक दृष्टि
Fuente:
Zenodo
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| Autore principale: | |
|---|---|
| Natura: | Recurso digital |
| Pubblicazione: |
Zenodo
2026
|
| Soggetti: | |
| Accesso online: | |
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| _version_ | 1866901640440709120 |
|---|---|
| author | जावळे, प्रतिभा आनंदराव |
| author_facet | जावळे, प्रतिभा आनंदराव |
| contents | <p><em><span lang="AR-SA">साहित्य की अन्य विधाओं नाटक अत्यंत समृद्ध विधा है।" काव्येषु नाटकं रम्यमं "कहकर नाट्य विधा का उद्घोष किया गया। इसकी लोकप्रियता के कारण ही भरतमुनि ने लिखा है "न कोई ऐसा ज्ञान है </span></em><em><span>,<span lang="AR-SA">न शिल्प है </span>,<span lang="AR-SA">न विद्या है </span>,<span lang="AR-SA">न योग है </span>,<span lang="AR-SA">न कर्म है जो नाटक में न दिखाई देता हो। " 1 नाटक एक ऐसा मिश्रण है जो मनुष्य के सारे इंद्रियों को सजग करता है।<span> </span>हिंदी नाटक भारतीय समाज की सांस्कृतिक</span>, <span lang="AR-SA">सामाजिक एवं वैचारिक संरचना का सशक्त माध्यम रहे हैं। स्त्री की प्रस्तुति हिंदी नाटकों में समय-समय पर बदलती सामाजिक चेतना</span>, <span lang="AR-SA">पितृसत्तात्मक सोच तथा स्त्रीवादी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है। प्रारंभिक हिंदी नाटकों में स्त्री प्रायः त्याग</span>, <span lang="AR-SA">सहनशीलता और मर्यादा की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत हुई</span>, <span lang="AR-SA">जबकि आधुनिक और समकालीन नाटकों में वह आत्मनिर्भर</span>, <span lang="AR-SA">संघर्षशील और विद्रोही स्वरूप में उभरती है। यह शोध-पत्र हिंदी नाटकों में स्त्री प्रस्तुति के विभिन्न आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार नाटककारों ने स्त्री को सामाजिक यथार्थ</span>, <span lang="AR-SA">अस्मिता और अधिकार की चेतना से जोड़ा है।</span></span></em></p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_18741039 |
| institution | Zenodo |
| language | |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | स्त्री प्रस्तुति हिंदी नाटकों में: एक आलोचनात्मक दृष्टि जावळे, प्रतिभा आनंदराव स्त्री प्रस्तुति, हिंदी नाटक, पितृसत्ता, स्त्रीवाद, अस्मिता <p><em><span lang="AR-SA">साहित्य की अन्य विधाओं नाटक अत्यंत समृद्ध विधा है।" काव्येषु नाटकं रम्यमं "कहकर नाट्य विधा का उद्घोष किया गया। इसकी लोकप्रियता के कारण ही भरतमुनि ने लिखा है "न कोई ऐसा ज्ञान है </span></em><em><span>,<span lang="AR-SA">न शिल्प है </span>,<span lang="AR-SA">न विद्या है </span>,<span lang="AR-SA">न योग है </span>,<span lang="AR-SA">न कर्म है जो नाटक में न दिखाई देता हो। " 1 नाटक एक ऐसा मिश्रण है जो मनुष्य के सारे इंद्रियों को सजग करता है।<span> </span>हिंदी नाटक भारतीय समाज की सांस्कृतिक</span>, <span lang="AR-SA">सामाजिक एवं वैचारिक संरचना का सशक्त माध्यम रहे हैं। स्त्री की प्रस्तुति हिंदी नाटकों में समय-समय पर बदलती सामाजिक चेतना</span>, <span lang="AR-SA">पितृसत्तात्मक सोच तथा स्त्रीवादी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है। प्रारंभिक हिंदी नाटकों में स्त्री प्रायः त्याग</span>, <span lang="AR-SA">सहनशीलता और मर्यादा की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत हुई</span>, <span lang="AR-SA">जबकि आधुनिक और समकालीन नाटकों में वह आत्मनिर्भर</span>, <span lang="AR-SA">संघर्षशील और विद्रोही स्वरूप में उभरती है। यह शोध-पत्र हिंदी नाटकों में स्त्री प्रस्तुति के विभिन्न आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार नाटककारों ने स्त्री को सामाजिक यथार्थ</span>, <span lang="AR-SA">अस्मिता और अधिकार की चेतना से जोड़ा है।</span></span></em></p> |
| title | स्त्री प्रस्तुति हिंदी नाटकों में: एक आलोचनात्मक दृष्टि |
| topic | स्त्री प्रस्तुति, हिंदी नाटक, पितृसत्ता, स्त्रीवाद, अस्मिता |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.18741039 |