_version_ 1866901928798060544
author प्रवीण, नाहिद
author_facet प्रवीण, नाहिद
contents <p><em><span>महात्मा गांधी का आर्थिक दर्शन विकेंद्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित था, जो ग्राम स्वराज के माध्यम से स्थानीय स्वावलंबन, स्वदेशी उत्पादन और समुदाय-केंद्रित निर्णयन को सर्वोच्च प्राथमिकता देता था। उनकी दृष्टि में, वर्तमान भूमंडलीकरण जो अति-केंद्रीकरण, सांस्कृतिक एकरूपता, पर्यावरणीय शोषण और आर्थिक निर्भरता को बढ़ावा देता है, एक संकटपूर्ण मॉडल है। गांधी बड़े उद्योगों और मशीनों का विरोध नहीं करते थे, बल्कि उन संरचनाओं का विरोध करते थे जो मानवीय गरिमा, रचनात्मकता और सामाजिक न्याय का हनन करती हैं। कोविड-19 महामारी ने अत्यधिक वैश्विक निर्भरता की नाजुकता को उजागर कर गांधी के आत्मनिर्भरता के विचार की प्रासंगिकता सिद्ध की है। हालाँकि, दोनों दृष्टियों के बीच “ग्लोकलाइजेशन” के माध्यम से सामंजस्य संभव है—जहाँ वैश्विक सहयोग और तकनीक का उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने, निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय स्थिरता हासिल करने के लिए किया जाए। इस प्रकार, गांधी का विकेंद्रीकरण का विजन न केवल भूमंडलीकरण के दोषों के प्रति एक नैतिक प्रतिवाद है, बल्कि एक लचीली, न्यायसंगत और टिकाऊ वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण का एक व्यावहारिक मार्गदर्शक भी है।</span></em></p> <p> </p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_18950034
institution Zenodo
language
publishDate 2026
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle गाँधी की दृष्टि में भूमंडलीकरण और आर्थिक विकेंद्रीकरण
प्रवीण, नाहिद
कीवर्ड: गाँधीवादी अर्थशास्त्र, भूमंडलीकरण, आर्थिक विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, केंद्रीकरण विरोध, लघु उद्योग, स्थानीय अर्थव्यवस्था, वैश्विक पूंजीवाद, आत्मनिर्भरता, टिकाऊ विकास, मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था, उपभोक्तावाद विरोध, पर्यावरणीय संतुलन
<p><em><span>महात्मा गांधी का आर्थिक दर्शन विकेंद्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित था, जो ग्राम स्वराज के माध्यम से स्थानीय स्वावलंबन, स्वदेशी उत्पादन और समुदाय-केंद्रित निर्णयन को सर्वोच्च प्राथमिकता देता था। उनकी दृष्टि में, वर्तमान भूमंडलीकरण जो अति-केंद्रीकरण, सांस्कृतिक एकरूपता, पर्यावरणीय शोषण और आर्थिक निर्भरता को बढ़ावा देता है, एक संकटपूर्ण मॉडल है। गांधी बड़े उद्योगों और मशीनों का विरोध नहीं करते थे, बल्कि उन संरचनाओं का विरोध करते थे जो मानवीय गरिमा, रचनात्मकता और सामाजिक न्याय का हनन करती हैं। कोविड-19 महामारी ने अत्यधिक वैश्विक निर्भरता की नाजुकता को उजागर कर गांधी के आत्मनिर्भरता के विचार की प्रासंगिकता सिद्ध की है। हालाँकि, दोनों दृष्टियों के बीच “ग्लोकलाइजेशन” के माध्यम से सामंजस्य संभव है—जहाँ वैश्विक सहयोग और तकनीक का उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने, निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय स्थिरता हासिल करने के लिए किया जाए। इस प्रकार, गांधी का विकेंद्रीकरण का विजन न केवल भूमंडलीकरण के दोषों के प्रति एक नैतिक प्रतिवाद है, बल्कि एक लचीली, न्यायसंगत और टिकाऊ वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण का एक व्यावहारिक मार्गदर्शक भी है।</span></em></p> <p> </p>
title गाँधी की दृष्टि में भूमंडलीकरण और आर्थिक विकेंद्रीकरण
topic कीवर्ड: गाँधीवादी अर्थशास्त्र, भूमंडलीकरण, आर्थिक विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, केंद्रीकरण विरोध, लघु उद्योग, स्थानीय अर्थव्यवस्था, वैश्विक पूंजीवाद, आत्मनिर्भरता, टिकाऊ विकास, मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था, उपभोक्तावाद विरोध, पर्यावरणीय संतुलन
url https://doi.org/10.5281/zenodo.18950034