| _version_ | 1866901796042047488 |
|---|---|
| author | Kumar, Aaditya Gokhale, Prasad |
| author_facet | Kumar, Aaditya Gokhale, Prasad |
| contents | <p><em><span><span> </span></span></em><span lang="HI">योग-शास्त्र भारतीय ज्ञान परंपरा की एक महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> जिसमे शरीर</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">मन और आत्मा को साधन का अभिन्न अंग माना गया हैं। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक योग की अवधारणा में निरंतर विकास देखने को मिलता हैं। पतंजली मुनि के योगसूत्र में शरीर को मुख्यतः चित्त-निरोध की प्रक्रिया का साधन माना गया हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> जहां आसान और प्राणायाम मानसिक स्थिरता के उपकरण हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">न की लक्ष्य। अथवा इनके कुछ विपरित हठयोग में शरीर को साधना का केन्द्रीय माध्यम माना गया हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"><span> </span>जिसमे शरीर शुद्धि</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">स्थिरता और ऊर्जा-जागरण के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति अर्थात राजयोग तक की सीढ़ी बताया गया हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">हठप्रदीपिका</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> घेरण्ड संहिता आदि हठ यौगिक ग्रंथों में शरीर को ही मोक्ष तक की सीढ़ी बताया गया हैं।अतः आधुनिक काल में आचार्य रजनीश ने इन दोनों परम्पराओ से आगे बढ़ते हुए शरीर को आनंदमयी-चेतना के प्रवेश-द्वार के रूप में पुनर्परीभाषित किया। ओशो ने शरीर को आत्म-बोध का आधार माना</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">उन्होंने शरीर को नकारना नहीं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">बल्कि शरीर के प्रति सहजता और स्वीकार भाव ही ध्यान की वास्तविक शुरुआत बताया। उनके विचार से शरीर से पलायन नहीं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">बल्कि शरीर के माध्यम से भी चेतना की गहरी अनुभूति संभव हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जो अंततः मानव को आनंदमयी अवस्था से शून्यता की अर्थपूर्ण अनुभूति की ओर ले जाती हैं।भारतीय दर्शन की परंपरा में शरीर को लेकर यह विविधता इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि आध्यात्मिक साधना कभी एकरेखीय नहीं रही हैं। प्रत्येक युग में मनुष्य की मानसिक संरचना और सामाजिक संदर्भों के अनुसार योग-दर्शन ने स्वयं को ढाला हैं। इस शोध पत्र का उद्देश्य पतंजलि के योग-दर्शन</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">हठयोग परंपरा तथा आचार्य रजनीश (ओशो) के विचारों के आलोक में शरीर की भूमिका का तुलनात्मक विश्लेषण करना हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शरीर का अर्थ केवल साधन या साधना तक सीमित न होकर सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि से संबंधित हैं। अतः यह शोध-पत्र शरीर का त्याग</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">नियंत्रण</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">शुद्धि और अंततः चेतना की अभिव्यक्ति- इन चार स्तर पर समझने का प्रयास करता हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जो कि भारतीय योग परंपरा की विकासात्मक यात्रा को स्पष्ट करता हैं। </span></p> <p> </p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_18955940 |
| institution | Zenodo |
| language | |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | योग-शास्त्र में शरीर की भूमिका: पतंजलि से आचार्य रजनीश तक Kumar, Aaditya Gokhale, Prasad मुख्यशब्द:योग-शास्त्र, पतंजलि, हठयोग, आचार्य रजनीश, ओशो, शरीर, चेतना <p><em><span><span> </span></span></em><span lang="HI">योग-शास्त्र भारतीय ज्ञान परंपरा की एक महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> जिसमे शरीर</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">मन और आत्मा को साधन का अभिन्न अंग माना गया हैं। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक योग की अवधारणा में निरंतर विकास देखने को मिलता हैं। पतंजली मुनि के योगसूत्र में शरीर को मुख्यतः चित्त-निरोध की प्रक्रिया का साधन माना गया हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> जहां आसान और प्राणायाम मानसिक स्थिरता के उपकरण हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">न की लक्ष्य। अथवा इनके कुछ विपरित हठयोग में शरीर को साधना का केन्द्रीय माध्यम माना गया हैं</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"><span> </span>जिसमे शरीर शुद्धि</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">स्थिरता और ऊर्जा-जागरण के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति अर्थात राजयोग तक की सीढ़ी बताया गया हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">हठप्रदीपिका</span><em><span>,</span></em><span lang="HI"> घेरण्ड संहिता आदि हठ यौगिक ग्रंथों में शरीर को ही मोक्ष तक की सीढ़ी बताया गया हैं।अतः आधुनिक काल में आचार्य रजनीश ने इन दोनों परम्पराओ से आगे बढ़ते हुए शरीर को आनंदमयी-चेतना के प्रवेश-द्वार के रूप में पुनर्परीभाषित किया। ओशो ने शरीर को आत्म-बोध का आधार माना</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">उन्होंने शरीर को नकारना नहीं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">बल्कि शरीर के प्रति सहजता और स्वीकार भाव ही ध्यान की वास्तविक शुरुआत बताया। उनके विचार से शरीर से पलायन नहीं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">बल्कि शरीर के माध्यम से भी चेतना की गहरी अनुभूति संभव हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जो अंततः मानव को आनंदमयी अवस्था से शून्यता की अर्थपूर्ण अनुभूति की ओर ले जाती हैं।भारतीय दर्शन की परंपरा में शरीर को लेकर यह विविधता इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि आध्यात्मिक साधना कभी एकरेखीय नहीं रही हैं। प्रत्येक युग में मनुष्य की मानसिक संरचना और सामाजिक संदर्भों के अनुसार योग-दर्शन ने स्वयं को ढाला हैं। इस शोध पत्र का उद्देश्य पतंजलि के योग-दर्शन</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">हठयोग परंपरा तथा आचार्य रजनीश (ओशो) के विचारों के आलोक में शरीर की भूमिका का तुलनात्मक विश्लेषण करना हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शरीर का अर्थ केवल साधन या साधना तक सीमित न होकर सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि से संबंधित हैं। अतः यह शोध-पत्र शरीर का त्याग</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">नियंत्रण</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">शुद्धि और अंततः चेतना की अभिव्यक्ति- इन चार स्तर पर समझने का प्रयास करता हैं</span><em><span>, </span></em><span lang="HI">जो कि भारतीय योग परंपरा की विकासात्मक यात्रा को स्पष्ट करता हैं। </span></p> <p> </p> |
| title | योग-शास्त्र में शरीर की भूमिका: पतंजलि से आचार्य रजनीश तक |
| topic | मुख्यशब्द:योग-शास्त्र, पतंजलि, हठयोग, आचार्य रजनीश, ओशो, शरीर, चेतना |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.18955940 |