सामाजिक प्रभुत्व की राजनीति : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Fuente: Zenodo
Salvato in:
Dettagli Bibliografici
Autore principale: सिंह, डॉ. रघुबर प्रसाद
Natura: Recurso digital
Lingua:hindi
Pubblicazione: Zenodo 2026
Accesso online:
Tags: Aggiungi Tag
Nessun Tag, puoi essere il primo ad aggiungerne!!
_version_ 1866901744142778368
author सिंह, डॉ. रघुबर प्रसाद
author_facet सिंह, डॉ. रघुबर प्रसाद
contents <p>प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय समाज और शासन व्यवस्था के भीतर सामाजिक वर्चस्व की बदलती प्रवृत्तियों और उसके राजनीतिक परिणामों का एक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय राजनीति जाति, श्रेणी और धार्मिक शक्ति के त्रिकोण पर टिकी रही है, जहाँ कुछ विशिष्ट समूहों ने सत्ता के संसाधनों पर अपना एकाधिकार बनाए रखा है। यह शोध इस मौलिक प्रश्न की पड़ताल करता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारंपरिक प्रभुत्व की संरचनाएं किस प्रकार स्वयं को पुनर्गठित कर रही हैं। पत्र में वर्चस्व के सिद्धांतों से लेकर समकालीन चुनावी राजनीति में इसके व्यवहारिक स्वरूप का मूल्यांकन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि क्या संवैधानिक समानता ने वास्तव में सामाजिक प्रभुत्व को समाप्त किया है या केवल इसके स्वरूप को बदलकर एक नए संभ्रांतवाद को जन्म दिया है। यह अध्ययन शक्ति के वितरण और सामाजिक न्याय के संघर्षों को समझने के लिए एक ठोस वैचारिक रूपरेखा प्रदान करता है।<br>इस अध्ययन की पद्धति मुख्य रूप से वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक है, जिसमें समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और चुनावी आंकड़ों का समन्वय किया गया है। शोध के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि सामाजिक प्रभुत्व अब केवल पारंपरिक भूमि स्वामित्व या उच्च जातीय स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह अब संख्यात्मक शक्ति और सांस्कृतिक पूंजी के नए मिश्रण से संचालित हो रहा है। पिछड़ी जातियों का राजनीतिक उभार और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती शक्ति ने पारंपरिक प्रभुत्व को चुनौती तो दी है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर अभी भी समूहों का एक नया विशिष्ट वर्ग काबिज है। शोध यह भी उजागर करता है कि पहचान की राजनीति ने विकास के विमर्श को अक्सर पीछे धकेल दिया है। अंततः, यह पत्र यह प्रतिपादित करता है कि वास्तविक सामाजिक लोकतंत्र तभी संभव है जब सत्ता का विकेंद्रीकरण प्रतीकात्मक होने के बजाय संरचनात्मक हो।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19144561
institution Zenodo
language hin
publishDate 2026
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle सामाजिक प्रभुत्व की राजनीति : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
सिंह, डॉ. रघुबर प्रसाद
<p>प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय समाज और शासन व्यवस्था के भीतर सामाजिक वर्चस्व की बदलती प्रवृत्तियों और उसके राजनीतिक परिणामों का एक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय राजनीति जाति, श्रेणी और धार्मिक शक्ति के त्रिकोण पर टिकी रही है, जहाँ कुछ विशिष्ट समूहों ने सत्ता के संसाधनों पर अपना एकाधिकार बनाए रखा है। यह शोध इस मौलिक प्रश्न की पड़ताल करता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारंपरिक प्रभुत्व की संरचनाएं किस प्रकार स्वयं को पुनर्गठित कर रही हैं। पत्र में वर्चस्व के सिद्धांतों से लेकर समकालीन चुनावी राजनीति में इसके व्यवहारिक स्वरूप का मूल्यांकन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि क्या संवैधानिक समानता ने वास्तव में सामाजिक प्रभुत्व को समाप्त किया है या केवल इसके स्वरूप को बदलकर एक नए संभ्रांतवाद को जन्म दिया है। यह अध्ययन शक्ति के वितरण और सामाजिक न्याय के संघर्षों को समझने के लिए एक ठोस वैचारिक रूपरेखा प्रदान करता है।<br>इस अध्ययन की पद्धति मुख्य रूप से वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक है, जिसमें समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और चुनावी आंकड़ों का समन्वय किया गया है। शोध के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि सामाजिक प्रभुत्व अब केवल पारंपरिक भूमि स्वामित्व या उच्च जातीय स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह अब संख्यात्मक शक्ति और सांस्कृतिक पूंजी के नए मिश्रण से संचालित हो रहा है। पिछड़ी जातियों का राजनीतिक उभार और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती शक्ति ने पारंपरिक प्रभुत्व को चुनौती तो दी है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर अभी भी समूहों का एक नया विशिष्ट वर्ग काबिज है। शोध यह भी उजागर करता है कि पहचान की राजनीति ने विकास के विमर्श को अक्सर पीछे धकेल दिया है। अंततः, यह पत्र यह प्रतिपादित करता है कि वास्तविक सामाजिक लोकतंत्र तभी संभव है जब सत्ता का विकेंद्रीकरण प्रतीकात्मक होने के बजाय संरचनात्मक हो।</p>
title सामाजिक प्रभुत्व की राजनीति : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
url https://doi.org/10.5281/zenodo.19144561