भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्तिक का सुदूर विस्तार

Fuente: Zenodo
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Autore principale: Somvanshi, Susheel
Natura: Recurso digital
Lingua:hindi
Pubblicazione: Zenodo 2026
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_version_ 1866901888693174272
author Somvanshi, Susheel
author_facet Somvanshi, Susheel
contents <p>स्वास्तिक न केवल एक ज्यामितीय आकृति है, बल्कि यह मानव इतिहास की अत्यंत प्राचीनतम सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत के उपसर्ग ‘सु’ (कल्याण) और ‘अस्ति’ (होना) से हुई है। ‘सु-अस्ति’ का अर्थ है—‘सभी का कल्याण हो’ या ‘मंगल हो’। प्राचीन भारतीय सभ्यता में स्वास्तिक को शुभ और पवित्र चिन्ह माना गया है। यह वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर रूप से पूजा, अनुष्ठान और दैनिक जीवन का हिस्सा रहा है। इस मांगलिक चिन्ह के पीछे गहरे दार्शनिक अर्थ निहित हैं, जो इसे केवल एक धार्मिक प्रतीक न बनाकर व्यापक जीवन दर्शन का प्रतिनिधि बनाते हैं।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19232658
institution Zenodo
language hin
publishDate 2026
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्तिक का सुदूर विस्तार
Somvanshi, Susheel
स्वास्तिक
संहिता
सौरमंडल
मंत्र
अद्भुत
खगोल
<p>स्वास्तिक न केवल एक ज्यामितीय आकृति है, बल्कि यह मानव इतिहास की अत्यंत प्राचीनतम सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत के उपसर्ग ‘सु’ (कल्याण) और ‘अस्ति’ (होना) से हुई है। ‘सु-अस्ति’ का अर्थ है—‘सभी का कल्याण हो’ या ‘मंगल हो’। प्राचीन भारतीय सभ्यता में स्वास्तिक को शुभ और पवित्र चिन्ह माना गया है। यह वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर रूप से पूजा, अनुष्ठान और दैनिक जीवन का हिस्सा रहा है। इस मांगलिक चिन्ह के पीछे गहरे दार्शनिक अर्थ निहित हैं, जो इसे केवल एक धार्मिक प्रतीक न बनाकर व्यापक जीवन दर्शन का प्रतिनिधि बनाते हैं।</p>
title भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्तिक का सुदूर विस्तार
topic स्वास्तिक
संहिता
सौरमंडल
मंत्र
अद्भुत
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url https://doi.org/10.5281/zenodo.19232658