विकसित भारत की संकल्पना में दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य का समन्वित अध्ययन

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Main Author: RC
Format: Recurso digital
Published: Zenodo 2026
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author RC
author_facet RC
contents <h1><span lang="EN-US">शोध सार</span></h1> <p><em><span lang="EN-US">विकसित भारत की संकल्पना केवल आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और तकनीकि प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के समन्वित विकास पर आधारित है। “<strong>पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।</strong></span></em><em><span lang="EN-US">”¹ </span></em><em><span lang="EN-US">यह युक्ति दार्शनिक विचार को सांस्कृतिक रूप से प्रस्तुत करती है और सांस्कृतिक चेतना जागती है। दर्शन भारतीय मनीषियों के द्वारा अनुभूत सत्य का परिचय देने वाला साहित्य है।हमारे अपूर्ण जीवन को पूर्णत्व की कोर्ट में पहुंचा देना दर्शन का वास्तविक उद्देश्य है।दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य मानव साहित्य के विकास के आधार स्तंभ रहे हैं।यह क्षेत्र न केवल मनुष्य की बौद्धिक चेतना को रिहा करते हैं,बल्कि समाज के नैतिक,सांस्कृतिक और रचनात्मक स्वरूप को भी आकर प्रदान करते हैं।दर्शन जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन करता है। जैसे सत्य, अस्तित्व ज्ञान और मूल्य,संस्कृति जीवन शैली, परंपरा और विचारों का समुच्चय है,जबकि साहित्य मानवीय अनुभवों की सजीव अभिव्यक्ति है।इन तींनों का परस्पर संबंध अत्यंत गहरा है। दर्शन विचार देता है, संस्कृति उसे जीवन में उतारती है और साहित्य उसे भावनात्मक व कलात्मक रूप से प्रस्तुत करता है ।</span></em></p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19410564
institution Zenodo
language
publishDate 2026
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle विकसित भारत की संकल्पना में दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य का समन्वित अध्ययन
RC
दर्शनशास्त्र, मानविकी, संस्कृति, साहित्य, भारतीय सभ्यता, नैतिक मूल्य, सामाजिक परिवर्तन, विकसित भारत, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत, मानव जीवन,वैश्विक दृष्टि, समन्वय ।
<h1><span lang="EN-US">शोध सार</span></h1> <p><em><span lang="EN-US">विकसित भारत की संकल्पना केवल आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और तकनीकि प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के समन्वित विकास पर आधारित है। “<strong>पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।</strong></span></em><em><span lang="EN-US">”¹ </span></em><em><span lang="EN-US">यह युक्ति दार्शनिक विचार को सांस्कृतिक रूप से प्रस्तुत करती है और सांस्कृतिक चेतना जागती है। दर्शन भारतीय मनीषियों के द्वारा अनुभूत सत्य का परिचय देने वाला साहित्य है।हमारे अपूर्ण जीवन को पूर्णत्व की कोर्ट में पहुंचा देना दर्शन का वास्तविक उद्देश्य है।दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य मानव साहित्य के विकास के आधार स्तंभ रहे हैं।यह क्षेत्र न केवल मनुष्य की बौद्धिक चेतना को रिहा करते हैं,बल्कि समाज के नैतिक,सांस्कृतिक और रचनात्मक स्वरूप को भी आकर प्रदान करते हैं।दर्शन जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन करता है। जैसे सत्य, अस्तित्व ज्ञान और मूल्य,संस्कृति जीवन शैली, परंपरा और विचारों का समुच्चय है,जबकि साहित्य मानवीय अनुभवों की सजीव अभिव्यक्ति है।इन तींनों का परस्पर संबंध अत्यंत गहरा है। दर्शन विचार देता है, संस्कृति उसे जीवन में उतारती है और साहित्य उसे भावनात्मक व कलात्मक रूप से प्रस्तुत करता है ।</span></em></p>
title विकसित भारत की संकल्पना में दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य का समन्वित अध्ययन
topic दर्शनशास्त्र, मानविकी, संस्कृति, साहित्य, भारतीय सभ्यता, नैतिक मूल्य, सामाजिक परिवर्तन, विकसित भारत, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत, मानव जीवन,वैश्विक दृष्टि, समन्वय ।
url https://doi.org/10.5281/zenodo.19410564