हिन्दी सिनेमा में बाल-मनोविज्ञान ('तारें ज़मीन पर' एवं 'हिचकी' फिल्म के विशेष संदर्भ में)

Fuente: Zenodo
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Autore principale: विशाल साहु शोधार्थी
Natura: Recurso digital
Pubblicazione: Zenodo 2026
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author विशाल साहु शोधार्थी
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contents <p><span lang="HI">मानव विकास के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करने के लिए मनुष्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन एक नितांत आवश्यकीय प्रकार्य है । मनोविज्ञान की एक बेहद ज़रूरी तथा संवेदनशील शाखा है ‘बाल-मनोविज्ञान’ । मनोविज्ञान की इस शाखा के अंतर्गत बाल-उम्र अर्थात बाल्यावस्था के दौर में एक शिशु के मानसिक विकास व द्वन्द्व आदि का अध्ययन किया जाता है । इस आधुनिक एवं प्रतिस्पर्धा के युग के मध्य बाल-उम्र में शिशुओं के मनस्तत्व का अध्ययन एक प्रासंगिक मुद्दा है । इस बाल-मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट करते हुए डॉ. सेलिया ए. डेकर कहते हैं, “</span><span>The scientific study of children from conception to adolescence is called child psychology or child development. Child development is concerned with changes the occur in children. It includes the way children’s bodies grow and develop. Child development is concerned with the way children think and learn, the way they feel about themselves, and the way they interact with others.<span lang="HI">”</span><sup>1</sup> (<span lang="HI">गर्भधारण से किशोरावस्था तक बच्चों के वैज्ञानिक अध्ययन को बाल-मनोविज्ञान या बाल-विकास कहा जाता है । बाल-विकास का संबंध बच्चों में होने वाले परिवर्तनों से है । इसमें बच्चों के शरीर के बढ़ने और विकसित होने के तरीके शामिल हैं । बाल-विकास का संबंध इस बात से है कि बच्चे किस तरह सोचते हैं और सीखते हैं, वे अपने बारे में कैसा महसूस करते हैं और कैसे वे दूसरों के साथ इन्टरेक्ट करते हैं ।</span>)<span lang="HI"> यह बाल-उम्र एक ऐसा समय है, जहाँ बच्चे कच्ची मिट्टी के बराबर होते हैं । इस उम्र में उन्हें जो आकार दिया जाएगा वे ताउम्र उस आकार में नज़र आएँगे । इसलिए बालों की मनःस्थिति का विज्ञान सम्मत अध्ययन आगामी पीढ़ि की नींव को सुदृढ़ बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है । इस अध्ययन के बलबूते बच्चों की उलझन और उसकी मनोदशा को समझते हुए उसका हल निकाला जाता है । इसलिए डॉ. सुरेन्द्र नाथ तिवारी कहते हैं, “बच्चों की भावनाओं, जिज्ञासाओं, कल्पनाओं आदि को ध्यान में रखते हुए उनकी समस्याओं का मनोवैज्ञानिक ढंग से हल करने का प्रयास किया जा रहा है । और बाल मनोविज्ञान की सहायता से बच्चों की उलझन समझी जा सकती है ।”<sup>2</sup></span></span></p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19426252
institution Zenodo
language
publishDate 2026
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle हिन्दी सिनेमा में बाल-मनोविज्ञान ('तारें ज़मीन पर' एवं 'हिचकी' फिल्म के विशेष संदर्भ में)
विशाल साहु शोधार्थी
<p><span lang="HI">मानव विकास के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करने के लिए मनुष्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन एक नितांत आवश्यकीय प्रकार्य है । मनोविज्ञान की एक बेहद ज़रूरी तथा संवेदनशील शाखा है ‘बाल-मनोविज्ञान’ । मनोविज्ञान की इस शाखा के अंतर्गत बाल-उम्र अर्थात बाल्यावस्था के दौर में एक शिशु के मानसिक विकास व द्वन्द्व आदि का अध्ययन किया जाता है । इस आधुनिक एवं प्रतिस्पर्धा के युग के मध्य बाल-उम्र में शिशुओं के मनस्तत्व का अध्ययन एक प्रासंगिक मुद्दा है । इस बाल-मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट करते हुए डॉ. सेलिया ए. डेकर कहते हैं, “</span><span>The scientific study of children from conception to adolescence is called child psychology or child development. Child development is concerned with changes the occur in children. It includes the way children’s bodies grow and develop. Child development is concerned with the way children think and learn, the way they feel about themselves, and the way they interact with others.<span lang="HI">”</span><sup>1</sup> (<span lang="HI">गर्भधारण से किशोरावस्था तक बच्चों के वैज्ञानिक अध्ययन को बाल-मनोविज्ञान या बाल-विकास कहा जाता है । बाल-विकास का संबंध बच्चों में होने वाले परिवर्तनों से है । इसमें बच्चों के शरीर के बढ़ने और विकसित होने के तरीके शामिल हैं । बाल-विकास का संबंध इस बात से है कि बच्चे किस तरह सोचते हैं और सीखते हैं, वे अपने बारे में कैसा महसूस करते हैं और कैसे वे दूसरों के साथ इन्टरेक्ट करते हैं ।</span>)<span lang="HI"> यह बाल-उम्र एक ऐसा समय है, जहाँ बच्चे कच्ची मिट्टी के बराबर होते हैं । इस उम्र में उन्हें जो आकार दिया जाएगा वे ताउम्र उस आकार में नज़र आएँगे । इसलिए बालों की मनःस्थिति का विज्ञान सम्मत अध्ययन आगामी पीढ़ि की नींव को सुदृढ़ बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है । इस अध्ययन के बलबूते बच्चों की उलझन और उसकी मनोदशा को समझते हुए उसका हल निकाला जाता है । इसलिए डॉ. सुरेन्द्र नाथ तिवारी कहते हैं, “बच्चों की भावनाओं, जिज्ञासाओं, कल्पनाओं आदि को ध्यान में रखते हुए उनकी समस्याओं का मनोवैज्ञानिक ढंग से हल करने का प्रयास किया जा रहा है । और बाल मनोविज्ञान की सहायता से बच्चों की उलझन समझी जा सकती है ।”<sup>2</sup></span></span></p>
title हिन्दी सिनेमा में बाल-मनोविज्ञान ('तारें ज़मीन पर' एवं 'हिचकी' फिल्म के विशेष संदर्भ में)
url https://doi.org/10.5281/zenodo.19426252