आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय आधारित महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता
Fuente:
Zenodo
Salvato in:
| Autore principale: | |
|---|---|
| Natura: | Recurso digital |
| Lingua: | hindi |
| Pubblicazione: |
Zenodo
2026
|
| Accesso online: | |
| Tags: |
Aggiungi Tag
Nessun Tag, puoi essere il primo ad aggiungerne!!
|
| _version_ | 1866901903227486208 |
|---|---|
| author | डॉ. मनोज कुमार, सिंह |
| author_facet | डॉ. मनोज कुमार, सिंह |
| contents | <p>आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय <em><span>¼</span><span>Gender Justice</span><span>½</span><span> </span></em> एक महत्वपूर्ण सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक विमर्श का विषय है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी के विचार अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। गांधीजी ने स्त्री-पुरुष समानता को मानव गरिमा और अहिंसा के सिद्धांत से जोड़ा। उनके अनुसार स्त्री पुरुष की अनुयायी नहीं, बल्कि उसकी सहचर और समान भागीदार है। उन्होंने स्त्रियों को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया और सामाजिक कुरीतियों - जैसे पर्दा प्रथा, दहेज, बाल विवाह तथा स्त्री शिक्षा की उपेक्षाकृका विरोध किया।गांधीजी का मानना था कि वास्तविक सामाजिक परिवर्तन केवल कानून से नहीं, बल्कि नैतिक जागृति और आत्मशुद्धि से संभव है। उनके ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के सिद्धांत लैंगिक हिंसा, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध प्रभावी नैतिक आधार प्रदान करते हैं। आज के दौर में जब लैंगिक असमानता, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर भेदभाव जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं, गांधीजी का नैतिक दृष्टिकोण और स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। इस प्रकार गांधीवादी विचार आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय की स्थापना के लिए एक मूल्यपरक और मानवीय आधार प्रस्तुत करते हैं।</p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19449549 |
| institution | Zenodo |
| language | hin |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय आधारित महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता डॉ. मनोज कुमार, सिंह <p>आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय <em><span>¼</span><span>Gender Justice</span><span>½</span><span> </span></em> एक महत्वपूर्ण सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक विमर्श का विषय है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी के विचार अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। गांधीजी ने स्त्री-पुरुष समानता को मानव गरिमा और अहिंसा के सिद्धांत से जोड़ा। उनके अनुसार स्त्री पुरुष की अनुयायी नहीं, बल्कि उसकी सहचर और समान भागीदार है। उन्होंने स्त्रियों को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया और सामाजिक कुरीतियों - जैसे पर्दा प्रथा, दहेज, बाल विवाह तथा स्त्री शिक्षा की उपेक्षाकृका विरोध किया।गांधीजी का मानना था कि वास्तविक सामाजिक परिवर्तन केवल कानून से नहीं, बल्कि नैतिक जागृति और आत्मशुद्धि से संभव है। उनके ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के सिद्धांत लैंगिक हिंसा, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध प्रभावी नैतिक आधार प्रदान करते हैं। आज के दौर में जब लैंगिक असमानता, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर भेदभाव जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं, गांधीजी का नैतिक दृष्टिकोण और स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। इस प्रकार गांधीवादी विचार आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय की स्थापना के लिए एक मूल्यपरक और मानवीय आधार प्रस्तुत करते हैं।</p> |
| title | आधुनिक समाज में लैंगिक न्याय आधारित महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.19449549 |