पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रजातांत्रिक दर्शन: एक वैचारिक पुनरावलोकन

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Auteur principal: श्री प्रभाकर
Format: Recurso digital
Langue:hindi
Publié: Zenodo 2023
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_version_ 1866901892058054656
author श्री प्रभाकर
author_facet श्री प्रभाकर
contents <p>प्रस्तुत शोध पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक चिंतन के उस पक्ष को उद्घाटित करता है, जिसे उन्होंने 'लोकतंत्र के भारतीयकरण' की संज्ञा दी थी। उपाध्याय जी का मानना था कि स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने जिस लोकतांत्रिक ढांचे को स्वीकार किया, वह काफी हद तक पश्चिमी नकल था और भारतीय जनमानस की 'चिति' (आत्मा) से मेल नहीं खाता था। उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो 'धर्म' (नैतिक मर्यादा) और 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उत्थान) पर टिकी होनी चाहिए। यह लेख उनके द्वारा प्रतिपादित 'लोकमत-परिष्कार' और सहभागी शासन की दार्शनिक प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है, जो आज के चुनावी दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
format Recurso digital
id zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19509779
institution Zenodo
language hin
publishDate 2023
publisher Zenodo
record_format zenodo
spellingShingle पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रजातांत्रिक दर्शन: एक वैचारिक पुनरावलोकन
श्री प्रभाकर
प्रजातांत्रिक दर्शन, एकात्म मानववाद, लोकमत-परिष्कार, अंत्योदय, धर्म-राज्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, वैचारिक सहिष्णुता, निर्वाचकीय शुद्धि, भारतीय चिति, दलीय शुचिता, नागरिक चेतना, वैधानिक निष्ठा, सत्ता-अनासक्ति, स्वदेशी जनतंत्र।
<p>प्रस्तुत शोध पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक चिंतन के उस पक्ष को उद्घाटित करता है, जिसे उन्होंने 'लोकतंत्र के भारतीयकरण' की संज्ञा दी थी। उपाध्याय जी का मानना था कि स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने जिस लोकतांत्रिक ढांचे को स्वीकार किया, वह काफी हद तक पश्चिमी नकल था और भारतीय जनमानस की 'चिति' (आत्मा) से मेल नहीं खाता था। उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो 'धर्म' (नैतिक मर्यादा) और 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उत्थान) पर टिकी होनी चाहिए। यह लेख उनके द्वारा प्रतिपादित 'लोकमत-परिष्कार' और सहभागी शासन की दार्शनिक प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है, जो आज के चुनावी दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
title पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रजातांत्रिक दर्शन: एक वैचारिक पुनरावलोकन
topic प्रजातांत्रिक दर्शन, एकात्म मानववाद, लोकमत-परिष्कार, अंत्योदय, धर्म-राज्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, वैचारिक सहिष्णुता, निर्वाचकीय शुद्धि, भारतीय चिति, दलीय शुचिता, नागरिक चेतना, वैधानिक निष्ठा, सत्ता-अनासक्ति, स्वदेशी जनतंत्र।
url https://doi.org/10.5281/zenodo.19509779