हिंदी आदिवासी कवियों की सामाजिक चेतना
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Zenodo
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| 1. Verfasser: | |
|---|---|
| Format: | Recurso digital |
| Veröffentlicht: |
Zenodo
2026
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| _version_ | 1866901847275470848 |
|---|---|
| author | भोसले, किरण सदानंद |
| author_facet | भोसले, किरण सदानंद |
| contents | <p class="MsoNormal"><strong><em><span>सारांश</span></em></strong></p> <p class="MsoNormal"><em><span><span> </span>पांच हजार वर्ष पूर्व से मौखिक रुप में आये साहित्य की विरासत संभालते हुए आदिवासी साहित्यिक आज भारत की हर मुख्य भाषाओं के साहित्य का सौष्ठव बढ़ा रहा है। आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक धरोहर उनके इस साहित्य में स्पष्ट रूप में झलकती है। सहजता, सरलता, निष्कपट एवं करुणामयी दृष्टि से वह सारी सृष्टि को अपनाता है। उसे सहेजकर रखना, उसे उन्नत बनाना ही उनकी सामाजिक चेतना का मूल विचार है। हिंदी आदिवासी कवि एवं कवयित्रियों की कविताओं में यहीं सामाजिक चेतना प्रकट होती है। अपनी समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक एवं अन्य समस्याओं का समाधान वह प्रजातांत्रिक पद्धति से ही करना चाहते हैं। वह अपने संवैधानिक मानवाधिकार के प्रति सजग होकर भी अपने उलगुलान या विद्रोह को प्रजातांत्रिक साधनों खडा करते हैं। जो मानव कल्याण के साथ साथ प्रकृति और सृष्टि के अन्य जीवों के जीवित अधिकार को प्रबल समर्थन देती है।</span></em></p> <p class="MsoNormal"> </p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_19535895 |
| institution | Zenodo |
| language | |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | हिंदी आदिवासी कवियों की सामाजिक चेतना भोसले, किरण सदानंद बीज शब्द: आदिवासी - आदिवासी समुदायों में जन्मे, सामाजिक चेतना - समाज के प्रति दृष्टिकोण, उलगुलान - आदिवासी समुदायों के आंदोलन। <p class="MsoNormal"><strong><em><span>सारांश</span></em></strong></p> <p class="MsoNormal"><em><span><span> </span>पांच हजार वर्ष पूर्व से मौखिक रुप में आये साहित्य की विरासत संभालते हुए आदिवासी साहित्यिक आज भारत की हर मुख्य भाषाओं के साहित्य का सौष्ठव बढ़ा रहा है। आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक धरोहर उनके इस साहित्य में स्पष्ट रूप में झलकती है। सहजता, सरलता, निष्कपट एवं करुणामयी दृष्टि से वह सारी सृष्टि को अपनाता है। उसे सहेजकर रखना, उसे उन्नत बनाना ही उनकी सामाजिक चेतना का मूल विचार है। हिंदी आदिवासी कवि एवं कवयित्रियों की कविताओं में यहीं सामाजिक चेतना प्रकट होती है। अपनी समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक एवं अन्य समस्याओं का समाधान वह प्रजातांत्रिक पद्धति से ही करना चाहते हैं। वह अपने संवैधानिक मानवाधिकार के प्रति सजग होकर भी अपने उलगुलान या विद्रोह को प्रजातांत्रिक साधनों खडा करते हैं। जो मानव कल्याण के साथ साथ प्रकृति और सृष्टि के अन्य जीवों के जीवित अधिकार को प्रबल समर्थन देती है।</span></em></p> <p class="MsoNormal"> </p> |
| title | हिंदी आदिवासी कवियों की सामाजिक चेतना |
| topic | बीज शब्द: आदिवासी - आदिवासी समुदायों में जन्मे, सामाजिक चेतना - समाज के प्रति दृष्टिकोण, उलगुलान - आदिवासी समुदायों के आंदोलन। |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.19535895 |