भारतीय ज्ञान परंपरा और संत काव्य
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Zenodo
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| Hauptverfasser: | , |
|---|---|
| Format: | Recurso digital |
| Veröffentlicht: |
Zenodo
2026
|
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| _version_ | 1866901937978343424 |
|---|---|
| author | डॉ. बृजेश कुमार सागर छेत्री |
| author_facet | डॉ. बृजेश कुमार सागर छेत्री |
| contents | <p>शोध सार-</p> <p>भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान और जीवन दर्शन के मूल स्तंभों पर दृढ़ता से आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य मानव के भौतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक कल्याण का एक सम्यक समन्वय करना है । प्राचीन काल में जो दार्शनिक ज्ञान वेदों की ऋचाओं, उपनिषदों के गंभीर और रहस्यमयी संवादों में संहिताबद्ध था, वही अमूल्य ज्ञान मध्यकाल की विषम परिस्थितियों में जनसामान्य तक पहुँचने के लिए संत काव्य के रूप में प्रवाहित हुआ । हिंदी साहित्य के मध्यकालीन इतिहास विशेषकर भक्तिकाल के अंतर्गत निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा, जिसे विद्वानों द्वारा संत काव्य धारा भी कहा जाता है, इस संत काव्य धारा ने भारतीय दार्शनिक चिंतन को संस्कृत भाषा और विशिष्ट विद्वानों की संकीर्ण सीमाओं से निकालकर सामान्य जन तक पहुँचाने का कार्य किया । कबीरदास, गुरु नानक देव, रैदास, दादू दयाल, मलूकदास और सुंदरदास जैसे महान संतों ने पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर अनुभवजन्य सत्य को आधार बनाकर जिस काव्य की रचना की, वह भारतीय ज्ञान परंपरा का ही एक व्यावहारिक, लोकतान्त्रिक और लोकोन्मुखी रूपांतरण था। यह शोध आलेख भारतीय ज्ञान परंपरा के तात्विक स्वरूप, दार्शनिक उद्गम, संत काव्य की वैचारिक पृष्ठभूमि, शास्त्रीय ज्ञान का यथार्थ चित्रण और तत्कालीन तथा आधुनिक समाज में इसके व्यापक प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। </p> <p>बीज शब्द- भारतीय ज्ञान परंपरा, संत काव्य, भारतीय दर्शन, निर्गुण भक्ति, मध्यकाल, भक्ति आंदोलन, अद्वैतवाद, सामाजिक समरसता। </p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_20143466 |
| institution | Zenodo |
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| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
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| spellingShingle | भारतीय ज्ञान परंपरा और संत काव्य डॉ. बृजेश कुमार सागर छेत्री <p>शोध सार-</p> <p>भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान और जीवन दर्शन के मूल स्तंभों पर दृढ़ता से आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य मानव के भौतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक कल्याण का एक सम्यक समन्वय करना है । प्राचीन काल में जो दार्शनिक ज्ञान वेदों की ऋचाओं, उपनिषदों के गंभीर और रहस्यमयी संवादों में संहिताबद्ध था, वही अमूल्य ज्ञान मध्यकाल की विषम परिस्थितियों में जनसामान्य तक पहुँचने के लिए संत काव्य के रूप में प्रवाहित हुआ । हिंदी साहित्य के मध्यकालीन इतिहास विशेषकर भक्तिकाल के अंतर्गत निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा, जिसे विद्वानों द्वारा संत काव्य धारा भी कहा जाता है, इस संत काव्य धारा ने भारतीय दार्शनिक चिंतन को संस्कृत भाषा और विशिष्ट विद्वानों की संकीर्ण सीमाओं से निकालकर सामान्य जन तक पहुँचाने का कार्य किया । कबीरदास, गुरु नानक देव, रैदास, दादू दयाल, मलूकदास और सुंदरदास जैसे महान संतों ने पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर अनुभवजन्य सत्य को आधार बनाकर जिस काव्य की रचना की, वह भारतीय ज्ञान परंपरा का ही एक व्यावहारिक, लोकतान्त्रिक और लोकोन्मुखी रूपांतरण था। यह शोध आलेख भारतीय ज्ञान परंपरा के तात्विक स्वरूप, दार्शनिक उद्गम, संत काव्य की वैचारिक पृष्ठभूमि, शास्त्रीय ज्ञान का यथार्थ चित्रण और तत्कालीन तथा आधुनिक समाज में इसके व्यापक प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। </p> <p>बीज शब्द- भारतीय ज्ञान परंपरा, संत काव्य, भारतीय दर्शन, निर्गुण भक्ति, मध्यकाल, भक्ति आंदोलन, अद्वैतवाद, सामाजिक समरसता। </p> |
| title | भारतीय ज्ञान परंपरा और संत काव्य |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.20143466 |