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| Main Authors: | , |
|---|---|
| Format: | Recurso digital |
| Language: | Hindi |
| Published: |
Zenodo
2026
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| Online Access: | https://doi.org/10.5281/zenodo.20330367 |
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| _version_ | 1866902032337600512 |
|---|---|
| author | शितोळे सविता मुगुटराव प्रो. डॉ. सुनीता मच्छिंद्र मोटे |
| author_facet | शितोळे सविता मुगुटराव प्रो. डॉ. सुनीता मच्छिंद्र मोटे |
| contents | <p><em><span>नाथपंथ आदिकालीन हिंदी साहित्य में धार्मिक साहित्य शिल्प विधान की दृष्टि से महत्वपूर्ण विशिष्ट धारा है। नाथपंथ ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा</span></em><em><span>, </span></em><em><span>हठयोग</span></em><em><span>-</span></em><em><span>साधना और दर्शन को गहराई से प्रभावित करने के साथ-साथ हिंदी साहित्य की लोककला तथा शिल्प-संस्कृति को भी समृद्ध किया। इसने लोक-जीवन</span></em><em><span>, </span></em><em><span>लोककला और साहित्य में अपनी अलग और स्थायी पहचान स्थापित की।नाथ योगियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों</span></em><em><span>,</span></em><em><span> कठोर योग-साधना और आत्मज्ञान के सिद्धांतों को साहित्यिक रूप देकर अभिव्यक्त किया। नाथपंथ के साहित्य में आध्यात्मिक भावनाओं और रहस्यों को व्यक्त करने के लिए कई विशिष्ट शिल्पगत उपकरणों का प्रयोग किया गया</span></em><em><span>, </span></em><em><span>जैसे</span></em><em><span> - </span></em><em><span>प्रकृति चित्रण</span></em><em><span>,</span></em><em><span>सरल लोकभाषा</span></em><em><span>,</span></em><em><span>संध्या भाषा</span></em><em><span>,</span></em><em><span>प्रतीकात्मक शैली</span></em><em><span>,</span></em><em><span>उलटबांसी</span></em><em><span>,</span></em><em><span>रहस्यात्मक अभिव्यक्ति।नाथपंथ साहित्य का शिल्प अत्यंत मौलिक और विशिष्ट है। इसमें भाषा</span></em><em><span>, </span></em><em><span>शैली</span></em><em><span>, </span></em><em><span>बिंब</span></em><em><span>, </span></em><em><span>प्रतीक और विभिन्न काव्यरूपों का विशेष महत्व है।</span></em></p> |
| format | Recurso digital |
| id | zenodo_https___doi_org_10_5281_zenodo_20330367 |
| institution | Zenodo |
| language | hin |
| publishDate | 2026 |
| publisher | Zenodo |
| record_format | zenodo |
| spellingShingle | नाथपंथ साहित्य : शिल्पगत अनुशीलन शितोळे सविता मुगुटराव प्रो. डॉ. सुनीता मच्छिंद्र मोटे <p><em><span>नाथपंथ आदिकालीन हिंदी साहित्य में धार्मिक साहित्य शिल्प विधान की दृष्टि से महत्वपूर्ण विशिष्ट धारा है। नाथपंथ ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा</span></em><em><span>, </span></em><em><span>हठयोग</span></em><em><span>-</span></em><em><span>साधना और दर्शन को गहराई से प्रभावित करने के साथ-साथ हिंदी साहित्य की लोककला तथा शिल्प-संस्कृति को भी समृद्ध किया। इसने लोक-जीवन</span></em><em><span>, </span></em><em><span>लोककला और साहित्य में अपनी अलग और स्थायी पहचान स्थापित की।नाथ योगियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों</span></em><em><span>,</span></em><em><span> कठोर योग-साधना और आत्मज्ञान के सिद्धांतों को साहित्यिक रूप देकर अभिव्यक्त किया। नाथपंथ के साहित्य में आध्यात्मिक भावनाओं और रहस्यों को व्यक्त करने के लिए कई विशिष्ट शिल्पगत उपकरणों का प्रयोग किया गया</span></em><em><span>, </span></em><em><span>जैसे</span></em><em><span> - </span></em><em><span>प्रकृति चित्रण</span></em><em><span>,</span></em><em><span>सरल लोकभाषा</span></em><em><span>,</span></em><em><span>संध्या भाषा</span></em><em><span>,</span></em><em><span>प्रतीकात्मक शैली</span></em><em><span>,</span></em><em><span>उलटबांसी</span></em><em><span>,</span></em><em><span>रहस्यात्मक अभिव्यक्ति।नाथपंथ साहित्य का शिल्प अत्यंत मौलिक और विशिष्ट है। इसमें भाषा</span></em><em><span>, </span></em><em><span>शैली</span></em><em><span>, </span></em><em><span>बिंब</span></em><em><span>, </span></em><em><span>प्रतीक और विभिन्न काव्यरूपों का विशेष महत्व है।</span></em></p> |
| title | नाथपंथ साहित्य : शिल्पगत अनुशीलन |
| url | https://doi.org/10.5281/zenodo.20330367 |